श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 13-17

 
श्लोक
विष्वग्विवर्धमानं तमिषुमात्रं दिने दिने ।
दग्धशैलप्रतीकाशं सन्ध्याभ्रानीकवर्चसम् ॥ १३ ॥
तप्तताम्रशिखाश्मश्रुं मध्याह्नार्कोग्रलोचनम् ॥ १४ ॥
देदीप्यमाने त्रिशिखे शूल आरोप्य रोदसी ।
नृत्यन्तमुन्नदन्तं च चालयन्तं पदा महीम् ॥ १५ ॥
दरीगम्भीरवक्त्रेण पिबता च नभस्तलम् ।
लिहता जिह्वयर्क्षाणि ग्रसता भुवनत्रयम् ॥ १६ ॥
महता रौद्रदंष्ट्रेण जृम्भमाणं मुहुर्मुहु: ।
वित्रस्ता दुद्रुवुर्लोका वीक्ष्य सर्वे दिशो दश ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
विष्वक्—चारों ओर; विवर्धमानम्—बढ़ता हुआ; तम्—उसको; इषु-मात्रम्—बाण की उड़ान; दिने दिने—प्रतिदिन; दग्ध—जला हुआ; शैल—पर्वत; प्रतीकाशम्—सदृश; सन्ध्या—शाम को; अभ्र-अनीक—बादलों के समूह की तरह; वर्चसम्—तेजमय; तप्त—पिघला हुआ; ताम्र—ताँबे के समान; शिखा—बाल; श्मश्रुम्—मूछें तथा दाढ़ी; मध्याह्न— दोपहर; अर्क—सूर्य के समान; उग्र-लोचनम्—प्रचण्ड नेत्र वाला; देदीप्यमाने—प्रकाशमान; त्रि-शिखे—तीन नोंक वाले; शूले—अपने भाले में; आरोप्य—रखकर; रोदसी—पृथ्वी तथा स्वर्ग; नृत्यन्तम्—नाचते हुए; उन्नदन्तम्—उच्चस्वर करते हुए; च—तथा; चालयन्तम्—चलते हुए; पदा—अपने पाँव से; महीम्—पृथ्वी को; दरी-गम्भीर—गुफा के समान गहरी; वक्त्रेण—मुख से; पिबता—पीता हुआ; च—भी; नभस्तलम्—आकाश को; लिहता—चाटते हुए; जिह्वया—जीभ से; ऋक्षाणि—तारों को; ग्रसता—निगल कर; भुवन-त्रयम्—तीनों लोकों को; महता—महान्; रौद्र-दंष्ट्रेण—भयानक दाँतों से; जृम्भमाणम्—जम्हाई लेते हुए; मुहु: मुहु:—पुन: पुन:; वित्रस्ता:—भयानक; दुद्रुवु:—दौड़ा; लोका:—लोग; वीक्ष्य— देखकर; सर्वे—समस्त; दिश: दश—दशों दिशाओं में ।.
 
अनुवाद
 
 उस असुर का शरीर चारों दिशाओं में छोड़े हुए बाण के समान प्रतिदिन बढऩे लगा। वह लम्बा और काला था, मानो कोई जला हुआ पर्वत हो। वह संध्याकालीन बादलों के समूह की भाँति दीप्ति से युक्त था। असुर के शरीर के बाल तथा उसकी दाढ़ी-मूछें पिघले ताँबे के रंग की थीं। उसके नेत्र मध्यान्हकालीन सूर्य की भाँति भेदने वाले थे। वह दुर्जय था और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपने प्रज्ज्वलित त्रिशूल पर तीनों लोकों को धारण किये हो। उच्चस्वर करके उसके नाचने और गाने से सारी पृथ्वी हिल उठी मानो भूकम्प आया हो। वह पुन: पुन: जम्हाई ले रहा था, मानो कन्दरा के समान अपने विशाल मुख में वह सारे आकाश को निगल जाना चाहत हो। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह आकाश के सभी तारों को अपनी जीभ से चाट रहा हो और अपने लम्बे पैने दाँतों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को खाने जा रहा हो। उस विराट असुर को देखकर सभी व्यक्ति डर के मारे इधर-उधर चारों दिशाओं में भागने लगे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥