श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 21

 
श्लोक
श्रीदेवा ऊचु:
वाय्वम्बराग्‍न्यप्क्षितयस्त्रिलोका
ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्त: ।
हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ
बिभेति यस्मादरणं ततो न: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-देवा: ऊचु:—देवताओं ने कहा; वायु—वायु; अम्बर—आकाश; अग्नि—अग्नि; अप्—जल; क्षितय:—तथा पृथ्वी से निर्मित; त्रि-लोका:—तीनों लोक; ब्रह्म-आदय:—ब्रह्मा इत्यादि; ये—जो; वयम्—हम सब; उद्विजन्त:—अत्यन्त उद्विग्न; हराम—प्रदान करते हैं; यस्मै—जिसको; बलिम्—भेंट; अन्तक:—संहर्ता, मृत्यु; असौ—वह; बिभेति—डरता है; यस्मात्—जिससे; अरणम्—शरण; तत:—इसलिए; न:—हमारा ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं ने कहा—तीनों लोकों की सृष्टि पंचतत्त्वों—क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर—से हुई हैं, जिनको ब्रह्मा आदि विभिन्न देवता अपने वश में रखते हैं। हम काल से अत्यन्त भयभीत है कि वह हमारे अस्तित्त्व का अन्त कर देगा, इसलिए वह जैसा चाहता है हम वैसा कार्य करके उसको अपनी भेंट चढ़ाते हैं। किन्तु काल श्रीभगवान् से स्वयं डरता है। अत: हम उसी एकमात्र परमेश्वर की आराधना करें जो हमारी पूरी तरह से रक्षा कर सकता है।
 
तात्पर्य
 जब किसी को मारे जाने का भय हो तो उसे श्रीभगवान् की शरण ग्रहण करनी चाहिए। ब्रह्मा से लेकर सभी देवता उनकी आराधना करते हैं, यद्यपि वे इस भौतिक जगत के विभिन्न तत्त्वों के स्वामी हैं। बिभेति यस्मात् शब्द बताते हैं कि सभी असुर, चाहे वे कितने महान् तथा शक्तिशाली क्यों न हों, श्रीभगवान् से भयभीत रहते हैं।
देवतागण मृत्यु से डरकर भगवान् की शरण में गये और उनसे यह प्रार्थना की यद्यपि काल सबों के लिए भयकारी है, किन्तु काल स्वयं श्रीभगवान् से डरता है, क्योंकि भगवान् को अभय कहते हैंं। श्रीभगवान् की शरण में जाने से वास्तविक निर्भीकता आती है, इसलिए सभी देवताओं ने भगवान् की शरण में जाने का निश्चय किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥