श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 32

 
श्लोक
यत्ते गतीनां तिसृणामीशितु: परमं पदम् ।
नार्वाचीनो विसर्गस्य धातर्वेदितुमर्हति ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो; ते—तुम्हारी; गतीनाम् तिसृणाम्—तीन प्रकार के गन्तव्य (स्वर्ग लोक, मर्त्य लोक तथा नरक); ईशितु:— नियामक; परमम् पदम्—परम धाम, वैकुण्ठलोक; न—नहीं; अर्वाचीन:—बाद में आने वाला पुरुष; विसर्गस्य—सृष्टि; धात:—हे परम नियामक; वेदितुम्—जानने हेतु; अर्हति—सक्षम है ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम नियामक! आप तीनों गन्तव्यों [स्वर्ग लोक में पहुँचना, मनुष्य के रूप में जन्म तथा नरक में यातना] को वश में रखने वाले हैं, फिर भी आपका परम धाम वैकुण्ठलोक है। चूँकि आपके द्वारा इस दृश्य जगत की उत्पत्ति के बाद हम प्रकट हुए हैं, अत: हम आपके कार्यकलापों को समझने में असमर्थ हैं। अत: हमारे पास आपको अर्पित करने के लिए नमस्कार करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
 
तात्पर्य
 अनुभवहीन व्यक्ति सामान्यतया यह नहीं जानता कि वह श्रीभगवान् से क्या माँगे। प्रत्येक मनुष्य इस भौतिक सृष्टि के अन्तर्गत है, इसलिए ईश्वर से प्रार्थना करते समय कौन-सा वर माँगा जाये कोई नहीं जानता। बहुत से लोग स्वर्गलोक पहुँचने के लिए प्रार्थना करते हैं क्योंकि वे वैकुण्ठलोक के विषय में कुछ जानते ही नहीं। श्रील मध्वाचार्य ने निम्न श्लोक उद्धृक्त किया है—
देव लोकात् पितृलोकात् निरयाच्चापि यत्परम्।

तिसृभ्य: परमं स्थानं वैष्णवं विदुषां गति: ॥

कई प्रकार के लोकमण्डल हैं यथा देवलोक, पितृलोक तथा निरय (नरक)। जब मनुष्य विभिन्न लोकों को पार करके वैकुण्ठलोक पहुँचता है, तो उसे वैष्णवों का परम आवास प्राप्त होता है। वैष्णवों को अन्य लोकों से कोई वास्ता नहीं है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥