श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 4

 
श्लोक
तद्देवहेलनं तस्य धर्मालीकं सुरेश्वर: ।
आलक्ष्य तरसा भीतस्तच्छीर्षाण्यच्छिनद् रुषा ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह; देव-हेलनम्—देवताओं के प्रति अपराध; तस्य—उस (विश्वरूप) का; धर्म-अलीकम्—धर्म के नाम पर धोखा; सुर-ईश्वर:—देवताओं का राजा; आलक्ष्य—देखकर; तरसा—शीघ्र; भीत:—डरा हुआ (कि विश्वरूप के आशीर्वाद से असुर शक्ति प्राप्त कर लेंगे); तत्—उसका (विश्वरूप का); शीर्षाणि—सिर; अच्छिनत्—काट दिया; रुषा—क्रोध से ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु एक बार स्वर्ग के राजा इन्द्र को पता चल गया कि विश्वरूप देवताओं को धोखा देकर असुरों की आहुतियाँ दे रहा है। अत: वह असुरों द्वारा पराजित किये जाने से अत्यधिक भयभीत हो उठा और अतीव क्रोध में उसने विश्वरूप के तीनों सिरों को उसके कंधों से अलग कर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥