श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 43

 
श्लोक
अत एव स्वयं तदुपकल्पयास्माकं भगवत: परमगुरोस्तव चरणशतपलाशच्छायां विविधवृजिन संसारपरिश्रमोपशमनीमुपसृतानां वयं यत्कामेनोपसादिता: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
अत एव—अत:; स्वयम्—अपने आप; तत्—वह; उपकल्पय—कृपया प्रबन्ध करें; अस्माकम्—हमारा; भगवत:— श्रीभगवान् का; परम-गुरो:—सबसे बड़ा गुरु; तव—तुम्हारा; चरण—पाँवों का; शत-पलाशत्—एक सौ पंखडिय़ों वाले कमल पुष्प की भाँति; छायाम्—छाया; विविध—अनेक; वृजिन—घातक स्थितियों से; संसार—इस बद्ध जीवन का; परिश्रम—कष्ट; उपशमनीम्—छुटकारा दिला कर; उपसृतानाम्—आपके चरणकमलों में शरण लेने वाले भक्त; वयम्— हम; यत्—जिसके लिए; कामेन—इच्छाओं से; उपसादिता:—(आपके चरणकमलों की शरण में) आने को बाध्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्! आप सर्वज्ञाता हैं, अत: आप अच्छी तरह जानते हैं कि हम आपके चरणकमलों की शरण में क्यों आये हैं, जिनकी छाया समस्त भौतिक अशान्तियों से छुटकारा दिलाने वाली है। चूँकि आप परम गुरु हैं और सब कुछ जानते हैं, अत: हमने आदेश प्राप्त करने के लिए आपके चरणकमलों का आश्रय लिया है। कृपया हमारे वर्तमान दुखों को दूर करके हमें शरण दीजिये। आपके चरणकमल ही पूर्ण समर्पित भक्त के एकमात्र आश्रय हैं और इस भौतिक जगत के संतापों को शमित करने के एकमात्र साधन हैं।
 
तात्पर्य
 मनुष्य को भगवान् के चरणकमलों की छाया का ही आश्रय लेना चाहिए। तभी उसे विचलित करने वाले समस्त भौतिक संताप उसी प्रकार शमित हो सकेंगे जिस प्रकार विशाल वृक्ष की छाया में झुलसाने वाली धूप का ताप बिना
माँगे तुरन्त शमित हो जाता है। अत: बद्धजीव का एकमात्र लक्ष्य ईश्वर के चरणकमलों की प्राप्ति होना चाहिए। ईश्वर के चरणकमलों की शरण पाकर बद्धजीव के समस्त सांसारिक संतापों का शमन हो सकता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥