श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 45

 
श्लोक
हंसाय दह्रनिलयाय निरीक्षकाय
कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय ।
सत्सङ्ग्रहाय भवपान्थनिजाश्रमाप्ता-
वन्ते परीष्टगतये हरये नमस्ते ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
हंसाय—महान् तथा शुद्ध को (पवित्रं परमम्, परम शुद्ध); दह्र—अन्त:स्थल में; निलयाय—जिसका धाम; निरीक्षकाय— प्रत्येक आत्मा की गतिविधियों का निरीक्षण करने के लिए; कृष्णाय—परमात्मा को, जो श्रीकृष्ण के अंश रूप हैं; मृष्ट यशसे—जिनका यश अत्यन्त प्रकाशमान् है; निरुपक्रमाय—जिसका आदि नहीं है, अनादि; सत्-सङ्ग्रहाय—शुद्ध भक्तों द्वारा ज्ञेय; भव-पान्थ-निज-आश्रम-आप्तौ—इस भौतिक जगत में प्राणियों के लिए श्रीकृष्ण की शरण प्राप्त करके; अन्ते—अन्त में; परीष्ट-गतये—जीवन की सबसे बड़ी सफलता, उन श्रीभगवान् को जो परम-लक्ष्य हैं; हरये—श्रीभगवान् को; नम:—सादर नमस्कार; ते—तुम्हें (आपको) ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्! हे परम शुद्ध! आप सबों के अन्त:स्थल में रहते हैं और बद्धजीवों की समस्त आकांक्षाओं तथा गतिविधियों का निरीक्षण करते हैं। श्रीकृष्ण के रूप में विख्यात हे भगवान्! आपका यश अत्यन्त प्रकाशमान है। आपका आदि नहीं है क्योंकि आप प्रत्येक वस्तु के उद्गम हैं। शुद्ध भक्त इससे परिचित हैं क्योंकि आप शुद्ध तथा सत्यनिष्ठ के लिए सुगम हैं। जब करोड़ों वर्षों तक भौतिक जगत में भटकने के बाद बद्धात्माएँ आपके चरणकमलों पर मुक्त होकर शरण पाती हैं, तो उन्हें जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। अत: हे भगवान्! हम आपके चरणारविन्द को सादर नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 देवतागण निश्चय ही भगवान् विष्णु से अपने कष्टों का मोचन चाहते थे, किन्तु अब वे सीधे भगवान् श्रीकृष्ण के ही पास पहुँचे। यद्यपि भगवान् विष्णु तथा भगवान् श्रीकृष्ण में कोई अन्तर नहीं है, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण अपने वासुदेव रूप में इस लोक में—परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्—अपने भक्तों को बचाने तथा दुष्टों का वध करने के लिए अवतरित होते हैं। असुर अथवा नास्तिक सदैव देवों या भक्तों को सताते रहते हैं, अत: नास्तिकों तथा असुरों को दंड देने और अपने भक्तों की इच्छा पूर्ति के लिए श्रीकृष्ण अवतरित होते हैं। श्रीकृष्ण प्रत्येक वस्तु का आदि कारण होने के फलस्वरुप विष्णु तथा नारायण से ऊपर परम पुरुष हैं, यद्यपि भगवान् के इन विभिन्न रूपों में कोई अन्तर नहीं हैं। जैसाकि ब्रह्म-संहिता (५.४६) में कहा गया है—
दीपार्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा।

यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

श्रीकृष्ण विष्णु के रूप में उसी प्रकार विस्तार करते हैं जिस प्रकार एक जलता दीप दूसरे को जलाता है। यद्यपि दोनों दीपकों की शक्ति में कोई अन्तर नहीं होता तथापि श्रीकृष्ण आदि-दीपक के समान हैं।

यहाँ मृष्ट-यशसे शब्द महत्त्वपूर्ण है क्योंकि श्रीकृष्ण भक्तों को संकट से छुड़ाने के लिए सदैव प्रसिद्ध हैं। जो भक्त श्रीकृष्ण में पूर्णतया समर्पित होता है और जिसका एकमात्र उद्धारक श्रीकृष्ण रहता है, उसे अकिञ्चन कहते हैं।

महारानी कुन्ती ने अपनी स्तुति में भगवान् को अकिञ्चन-वित्त अर्थात् भक्त का धन कहा है। जो बद्ध जीवन के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं, वे वैकुण्ठ लोक को जाते हैं जहाँ उन्हें पाँच प्रकार की मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं—सायुज्य, सालोक्य, सारूप्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। ये रस श्रीकृष्ण से उद्भूत हैं। जैसाकि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कहा है आदि रस माधुर्य प्रेम है। श्रीकृष्ण शुद्ध और आध्यात्मिक माधुर्य प्रेम के उद्गम हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥