श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 55

 
श्लोक
तस्मिन् विनिहते यूयं तेजोऽस्त्रायुधसम्पद: ।
भूय: प्राप्स्यथ भद्रं वो न हिंसन्ति च मत्परान् ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—जब वह (वृत्रासुर); विनिहते—मारा जाता है; यूयम्—तुम सभी; तेज:—तेज; अस्त्र—तीर; आयुध—अन्य हथियार; सम्पद:—तथा ऐश्वर्य; भूय:—फिर; प्राप्स्यथ—प्राप्त करोगे; भद्रम्—समस्त कल्याण; व:—तुमको; न—नहीं; हिंसन्ति—पीड़ा पहुँचाएँगे; च—तथा; मत्-परान्—मेरे भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 जब वृत्रासुर मेरे आत्मबल (ब्रह्मतेज) से मर जायेगा, तो तुम्हें पुन: अपना तेज आयुध तथा सम्पत्ति प्राप्त हो जायेगी। इस प्रकार तुम सबका कल्याण होगा। यद्यपि वृत्रासुर तीनों लोकों को विनष्ट कर सकता हैं, किन्तु तुम मत डरो कि वह तुम्हें हानि पहुँचायेगा। वह भी भक्त है और तुमसे कभी भी विद्वेष नहीं करेगा।
 
तात्पर्य
 भगवान् का भक्त किसी से द्वेष नहीं रखता, अन्य भक्तों की तो दूसरी ही बात है। जैसाकि बाद में पता चला, वृत्रासुर भी भक्त था। अत: उससे यह आशा नहीं की जाती थी कि वह देवताओं से द्वेष रखेगा। उल्टे, वह स्वत: देवताओं का हित करना चाहेगा। भक्त सत्कार्य के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देता है। चाणक्य पंडित ने कहा है—सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति। अन्तत: मनुष्य की सारी सम्पत्ति, यहाँ तक कि शरीर भी नष्ट हो जायेगा।
अत: यदि किसी सत्कार्य में इनका प्रयोग हो तो भक्त अपना शरीर भी देने से नहीं कतराता। चूँकि भगवान् विष्णु देवताओं की रक्षा करना चाहते थे, अत: वृत्रासुर, जो तीनों लोकों को निगल सकता था, देवताओं द्वारा मारे जाने के लिए उद्यत हो जायेगा। भक्त के लिए जीने तथा मरने में कोई अन्तर नहीं होता, क्योंकि जीने पर वह भगवान् की भक्ति करता है और देह त्यागने के बाद वैकुण्ठ में भी वही सेवा करता है। उसकी भक्ति निर्बाध चलती जाती है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध के अन्तर्गत “राक्षस वृत्रासुर का आविर्भाव” नामक नवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥