श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
सम: प्रिय: सुहृद्ब्रह्मन् भूतानां भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रस्यार्थे कथं दैत्यानवधीद्विषमो यथा ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—महाराज परीक्षित ने कहा; सम:—समान; प्रिय:—प्रिय; सुहृत्—मित्र; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण (शुकदेव); भूतानाम्—समस्त जीवों के; भगवान्—परमेश्वर, विष्णु; स्वयम्—स्वयं; इन्द्रस्य—इन्द्र के; अर्थे—लाभ के लिए; कथम्— कैसे; दैत्यान्—असुरों को; अवधीत्—मारा; विषम:—पक्षपात; यथा—मानो ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित ने पूछा : हे ब्राह्मण, भगवान् विष्णु सबों के शुभचिन्तक होने के कारण हर एक को समान रूप से अत्यधिक प्रिय हैं, तो फिर उन्होंने किस तरह एक साधारण मनुष्य की भांति इन्द्र का पक्षपात किया और उसके शत्रुओं को मारा? सबों के प्रति समभाव रखने वाला व्यक्ति कुछ लोगों के तरह किसी के प्रति पक्षपात करेगा और अन्यों के प्रति शत्रु-भाव रखेगा?
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.२९) में भगवान् कहते हैं—समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:—“मैं सबों पर समभाव रखता हूँ; न तो कोई मुझे प्रिय है, न कोई मेरा शत्रु है” किन्तु पिछले स्कन्ध में यह देखा गया है कि भगवान् ने इन्द्र के लिए असुरों का वध करके उसका पक्षपात किया (हतपुत्रा दिति: शक्रपार्ष्णिग्राहेण विष्णुना )। अतएव भगवान् स्पष्टत: इन्द्र के पक्षधर थे यद्यपि वे सबों के हृदय में स्थित परमात्मा हैं। जिस तरह सबों को आत्मा अत्यन्त प्रिय है उसी प्रकार सबों को परमात्मा भी प्रिय हैं। अतएव परमात्मा से कोई त्रुटि नहीं हो सकती। रूप तथा स्थिति का विचार किये बिना भगवान् सभी जीवों के प्रति सदैव दयालु रहते हैं फिर भी उन्होंने एक सामान्य मित्र की भाँति इन्द्र का पक्ष-समर्थन किया। यही परीक्षित महाराज की जिज्ञासा का विषय था। कृष्ण-भक्त के रूप में वे यह भली-भाँति जानते थे कि कृष्ण किसी का पक्षपात नहीं करते किन्तु जब उन्होंने देखा कि कृष्ण ने दैत्यों के साथ शत्रु की भाँति आचरण किया तो उन्हें कुछ सन्देह होने लगा। अतएव उन्होंने स्पष्ट उत्तर जानने के लिए शुकदेव गोस्वामी से यह प्रश्न पूछा।
भक्त यह कभी स्वीकार नहीं करेगा कि भगवान् विष्णु में भौतिक गुण होते हैं। महाराज परीक्षित भली-भाँति जानते थे कि दिव्य होने के कारण भगवान् विष्णु को भौतिक गुणों से कुछ लेना-देना नहीं है किन्तु अपने इस विचार की पुष्टि के लिए वे प्रामाणिक पुरुष शुकदेव गोस्वामी से सुनना चाहते थे। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं—समस्य कथं वैषम्यम्—चूँकि भगवान् समदर्शी हैं, अतएव वे किसी का पक्ष ग्रहण क्यों करेंगे? प्रियस्य कथम् असुरेषु प्रीत्यभाव:। परमात्मा होने के कारण भगवान् प्रत्येक को अत्यन्त प्रिय हैं। तो फिर भगवान् असुरों के प्रति निष्ठुरता क्यों बरतने लगें? यह पक्षपात किसलिए? सुहृदश्च कथं तेष्वसौहार्दम्। चूँकि भगवान् कहते हैं कि वे सुहृदं सर्वभूतानाम् अर्थात् समस्त जीवों के शुभचिन्तक हैं, तो फिर उन्होंने दैत्यों का वध करके पक्षपात क्यों करते हैं? ये प्रश्न परीक्षित महाराज के मन में उठे अतएव उन्होंने शुकदेव गोस्वामी से प्रश्न किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥