श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 10

 
श्लोक
यदा सिसृक्षु: पुर आत्मन: परो
रज: सृजत्येष पृथक् स्वमायया ।
सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरीश्वर:
शयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; सिसृक्षु:—सृष्टि करने को इच्छुक; पुर:—भौतिक शरीर; आत्मन:—जीवों के लिए; पर:—भगवान्; रज:— रजोगुण; सृजति—प्रकट करता है; एष:—वह; पृथक्—अलग, मुख्यतया; स्व-मायया—अपनी सृजन शक्ति के द्वारा; सत्त्वम्—सतोगुण; विचित्रासु—विभिन्न प्रकार के शरीरों में; रिरंसु:—कर्म करने का इच्छुक; ईश्वर:—भगवान्; शयिष्यमाण:—समाप्त करने के निकट; तम:—तमोगुण; ईरयति—प्रकट करता है; असौ—वह परमेश्वर ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् विभिन्न प्रकार के शरीर उत्पन्न करते हैं और प्रत्येक जीव को उसके चरित्र तथा सकाम कर्मों के अनुसार विशिष्ट प्रकार का शरीर प्रदान करते हैं, तो वे प्रकृति के सारे गुणों— सत्त्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण—को पुनरुज्जीवित करते हैं। तब परमात्मा के रूप में वे प्रत्येक शरीर में प्रविष्ट होकर सृजन, पालन तथा संहार के गुणों को प्रभावित करते हैं जिनमें से सतोगुण का उपयोग पालन के लिए, रजोगुण का उपयोग सृजन के लिए तथा तमोगुण का उपयोग संहार के लिए किया जाता है।
 
तात्पर्य
 यद्यपि भौतिक प्रकृति का संचालन सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण के द्वारा होता है, लेकिन प्रकृति स्वतंत्र नहीं है। जैसाकि भगवान् भगवद्गीता (९.१०) में कहते हैं— मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥

“हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन के अन्तर्गत कार्य कर रही है और यह समस्त चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न कर रही है। इसके नियमानुसार इस जगत का बारम्बार सृजन तथा विनाश होता रहता है।” भौतिक जगत में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन तीनों गुणों की क्रियाओं- प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप होते हैं, किन्तु इन तीनों गुणों से भी ऊपर उनका अध्यक्ष परमेश्वर होता है। प्रकृति (यन्त्रारूढानि मायया ) द्वारा जीवों को प्रदत्त विभिन्न प्रकार के शरीरों में या तो सत्त्वगुण प्रधान होता है, अथवा रजोगुण या तमोगुण। शरीर की उत्पत्ति प्रकृति द्वारा भगवान् के निर्देशानुसार होती है। इसलिए यहाँ पर कहा गया है—यदा सिसृक्षु: पुर आत्मन: पर: जो सूचित करता है कि यह शरीर निश्चित रूप से भगवान् द्वारा सृजित है। कर्मणा दैवनेत्रेण—जीव के कर्मानुसार भगवान् के निर्देशन में शरीर निर्मित किया जाता है। यह शरीर सतोगुणी है, या रजोगुणी अथवा तमोगुणी, यह सब बहिरंगा शक्ति के द्वारा (पृथक् स्वमायया ) भगवान् के निर्देशन में सम्पन्न किया जाता है। इस प्रकार भगवान् (ईश्वर ) विभिन्न प्रकार के शरीरों में परमात्मा रूप में निर्देश देते हैं और पुन: शरीर को विनष्ट करने के लिए। वे तमोगुण का उपयोग करते हैं। इस तरह से जीवों को विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥