श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 12

 
श्लोक
य एष राजन्नपि काल ईशिता
सत्त्वं सुरानीकमिवैधयत्यत: ।
तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो
रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवा: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; एष:—यह; राजन्—हे राजा; अपि—भी; काल:—काल, समय; ईशिता—परमेश्वर; सत्त्वम्—सतोगुण; सुर- अनीकम्—अनेक देवताओं को; इव—निश्चय ही; एधयति—बढ़ाता है; अत:—अतएव; तत्-प्रत्यनीकान्—उनके प्रति वैर भाव; असुरान्—असुरों को; सुर-प्रिय:—देवताओं का मित्र होने से; रज:-तमस्कान्—रजो तथा तमों गुणों से आच्छादित; प्रमिणोति—नष्ट करता है; उरु-श्रवा:—जिसका यश दूर-दूर तक फैला है ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन् यह काल सत्त्वगुण को बढ़ाता है। इस तरह यद्यपि परमेश्वर नियन्ता हैं, किन्तु वे देवताओं पर कृपालु होते हैं, जो अधिकांशत: सतोगुणी होते हैं। तभी तमोगुणी असुरों का विनाश होता है। परमेश्वर काल को विभिन्न प्रकार से कार्य करने के लिए प्रभावित करते हैं, किन्तु वे कभी पक्षपात नहीं करते। उनके कार्यकलाप यशस्वी हैं, अतएव वे उरुश्रवा कहलाते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.२९) में भगवान् कहते हैं—समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:—न तो मैं किसी से ईर्ष्या करता हूँ, न मैं किसी का पक्षपात करता हूँ, मैं सबों के प्रति समभाव रखता हूँ। भगवान् पक्षपात नहीं कर सकते; वे सबों के प्रति सदैव समभाव रखते हैं। अतएव जब देवताओं पर कृपा की जाती है और असुरों का वध होता है, तो यह पक्षपात नहीं होता, अपितु काल का प्रभाव होता है। इसका एक अच्छा उदाहरण यह है कि बिजली का मिस्त्री एक ही विद्युत् शक्ति से हीटर तथा कूलर को जोड़ता है। गरम करने तथा ठंडा करने का कारण मिस्त्री द्वारा इच्छानुसार विद्युतशक्ति का समायोजन होता है। परन्तु वस्तुत: मिस्त्री को न तो गरम अथवा ठंडा करने से, न ही उससे उत्पन्न सुख या दुख से कोई प्रयोजन रहता है।
ऐसी अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ हैं जिसमें भगवान् ने किसी असुर का वध किया, किन्तु भगवान् की कृपा से उसे उच्चतर पद मिल गया। पूतना इसका एक उदाहरण है। पूतना का उद्देश्य कृष्ण को मार डालना था। अहो बकी यं स्तनकालकूटम्। वह अपने स्तनों में विष लगाकर कृष्ण को मारने के उद्देश्य से नन्द महाराज के घर गई, किन्तु जब वह मार डाली गई तो उसे वैसा ही उच्चतम पद प्राप्त हुआ जैसाकि कृष्ण की माता को। कृष्ण इतने दयालु तथा निष्पक्ष हैं कि चूँकि उन्होंने पूतना का स्तनपान किया था, अतएव उन्होंने तुरन्त उसे अपनी माता के रूप में स्वीकार कर लिया। पूतना का इस प्रकार वध करने से भगवान् की निष्पक्षता में कोई कमी नहीं आई। वे सबों के मित्र हैं—सुहृदं सर्वभूतानाम्। अतएव भगवान् के चरित्र पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि परम नियंता के अपने पद को वे सदा बनाए रखते हैं। भगवान् ने पूतना का वध शत्रु के रूप में किया, किन्तु उनके परम नियन्ता होने के कारण उसे उनकी माता जैसे उच्च पद की प्राप्ति हुई। अतएव श्रील मध्व मुनि कहते हैं—काले कालविषयेऽपीशिता देहादि कारणत्वात् सुरानीकम् इव स्थितं सत्त्वम्। सामान्यतया हत्यारे को फाँसी दी जाती है और मनु-संहिता में तो कहा गया है कि राजा हत्यारे का वध करके उस पर कृपा करता है और इस प्रकार उसे विविध प्रकार के कष्टों से बचा लेता है। अपने पापमय कर्मों के कारण ऐसा हत्यारा राजा की कृपा से मार दिया जाता है। कृष्ण परम न्यायकर्ता के रूप में इसी प्रकार से आचरण करते हैं, क्योंकि वे परम नियन्ता हैं। अतएव निष्कर्ष यह निकला कि भगवान् सदैव निष्पक्ष रहते हैं और सभी जीवों पर अत्यधिक दयालु हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥