श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 16

 
श्लोक
श्रीयुधिष्ठिर उवाच
अहो अत्यद्भ‍ुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि ।
वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विष: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-युधिष्ठिर: उवाच—महाराज युधिष्ठिर ने कहा; अहो—ओह; अति-अद्भुतम्—अत्यन्त आश्चर्यजनक; हि—निश्चय ही; एतत्— यह; दुर्लभ—प्राप्त करने में कठिन; एकान्तिनाम्—अध्यात्मवादियों के लिए; अपि—भी; वासुदेवे—वासुदेव में; परे—परम; तत्त्वे—परम सत्य; प्राप्ति:—प्राप्ति; चैद्यस्य—शिशुपाल की; विद्विष:—ईर्ष्यालु ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज युधिष्ठिर ने पूछा : यह अत्यन्त आश्चर्यजनक है कि असुर शिशुपाल अत्यन्त ईर्ष्यालु होते हुए भी भगवान् के शरीर में लीन हो गया। यह सायुज्य मुक्ति बड़े-बड़े अध्यात्मवादियों के लिए भी दुष्प्राप्य है, तो फिर भगवान् के शत्रु को यह कैसे प्राप्त हुई?
 
तात्पर्य
 अध्यात्मवादियों की दो श्रेणियाँ हैं—ज्ञानी तथा भक्त। भक्तगण भगवान् के शरीर में लीन होने की कोई इच्छा नहीं रखते लेकिन ज्ञानी जन ऐसा चाहते हैं। किन्तु शिशुपाल न तो ज्ञानी था, न ही भक्त। फिर भी मात्र
भगवान् से ईर्ष्या करने के कारण उसे भगवान् के शरीर में लीन होने जैसी सद्गति प्राप्त हुई। निश्चय ही यह आश्चर्यजनक था, अतएव महाराज युधिष्ठिर ने शिशुपाल के ऊपर भगवान् की इस रहस्यमयी कृपा का कारण पूछा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥