श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 19

 
श्लोक
शपतोरसकृद्विष्णुं यद्ब्रह्म परमव्ययम् ।
श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तम: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
शपतो:—निन्दा करने वाले शिशुपाल तथा दन्तवक्र दोनों ही का; असकृत्—बारम्बार; विष्णुम्—भगवान् कृष्ण को; यत्— जो; ब्रह्म परम्—परब्रह्म; अव्ययम्—बिना किसी कमी के; श्वित्र:—श्वेत कुष्ठ; न—नहीं; जात:—प्रकट; जिह्वायाम्—जीभ पर; न—नहीं; अन्धम्—अँधेरा; विविशतु:—वे घुसे; तम:—नरक में ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि शिशुपाल तथा दन्तवक्र दोनों ही भगवान् विष्णु (कृष्ण) की बारम्बार निन्दा करते रहे तो भी वे पूर्ण स्वस्थ रहे। न तो उनकी जीभों में ही श्वेत कुष्ठ रोग हुआ, न वे नारकीय जीवन के गहन अंधकार में प्रविष्ट हुए। हम सचमुच इससे अत्यधिक चकित हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१०.१२) में अर्जुन ने कृष्ण का वर्णन इस प्रकार किया है—परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्—आप परब्रह्म, परम धाम तथा पवित्र करने वाले हैं। यहाँ पर इसकी पुष्टि हुई है। विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम्।
विष्णु ही कृष्ण हैं। कृष्ण विष्णु के कारण हैं, इसके विपरीत नहीं। इसी प्रकार ब्रह्म कृष्ण के कारण नहीं हैं, अपितु कृष्ण ब्रह्म के कारण हैं। अतएव कृष्ण परब्रह्म हैं (यद् ब्रह्म परमव्ययम् )।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥