श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 2

 
श्लोक
न ह्यस्यार्थ: सुरगणै: साक्षान्नि:श्रेयसात्मन: ।
नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्चागुणस्य हि ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निश्चय ही; अस्य—उनके; अर्थ:—लाभ, हित; सुर-गणै:—देवताओं के साथ; साक्षात्—स्वयं; नि:श्रेयस— सर्वोच्च वरदान का; आत्मन:—जिसका स्वभाव; न—नहीं; एव—निश्चय ही; असुरेभ्य:—असुरों के लिए; विद्वेष:—ईर्ष्या, द्वेष; न—नहीं; उद्वेग:—भय; च—तथा; अगुणस्य—भौतिक गुणों से रहित; हि—निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु साक्षात् भगवान् तथा समस्त आनन्द के आगार हैं; अतएव उन्हें देवताओं का पक्ष-ग्रहण करने से क्या लाभ मिलेगा? इस प्रकार उनका कौन सा स्वार्थ सधेगा? जब भगवान् दिव्य हैं, तो फिर उन्हें असुरों से भय कैसा? और उनसे ईर्ष्या कैसी?
 
तात्पर्य
 हमें आध्यात्मिक तथा भौतिक के अन्तर को सदैव स्मरण रखना चाहिए। जो भौतिक है, वह भौतिक गुणों द्वारा संदूषित रहता है किन्तु जो आध्यात्मिक या दिव्य है उसे ये गुण छू तक नहीं पाते। कृष्ण चाहे भौतिक जगत में रहें या आध्यात्मिक जगत में, वे रहते हैं परम ही। जब हमें कृष्ण में पक्षपात दिखता है, तो यह दृष्टि उनकी बहिरंगा शक्ति के कारण होती है। अन्यथा उनके शत्रु उनके द्वारा वध किये जाने पर किस तरह मोक्ष प्राप्त कर सके? प्रत्येक व्यक्ति जो भगवान् से आदान-प्रदान करता है धीरे-धीरे भगवान् केा गुण अर्जित कर लेता है। जो आध्यात्मिक चेतना में जितनी अधिक प्रगति कर लेता है, वह भौतिक गुणों के द्वन्द्व (द्वैत) से उतना ही कम प्रभावित होता है। अतएव परमेश्वर निश्चित रूप से इन गुणों से मुक्त होते हैं। उनकी शत्रुता तथा मित्रता भौतिक शक्ति द्वारा प्रस्तुत किये गये बाह्यगुण हैं। भगवान् तो नित्य दिव्य हैं, वे परम निरपेक्ष हैं, चाहे वे मारें या वर दें।
ईर्ष्या तथा मैत्री-भाव का उदय उसी में होता है, जो अपूर्ण है। हम अपने शत्रुओं से भयभीत रहते हैं क्योंकि इस भौतिक जगत में हमें सदैव सहायता की आवश्यकता बनी रहती है। किन्तु भगवान् को किसी की भी सहायता नहीं चाहिए, क्योंकि वे आत्माराम हैं। भगवद्गीता (९.२६) में भगवान् कहते हैं—

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन: ॥

“यदि कोई भक्त मुझे भक्तिपूर्वक एक पत्ता, एक फूल, फल या जल प्रदान करता है, तो उसे मैं स्वीकार करता हूँ।” भगवान् ऐसा क्यों कहते हैं? क्या वे भक्त की भेंट पर आश्रित हैं? वास्तव में वे आश्रित नहीं हैं किन्तु वे अपने भक्त पर आश्रित रहना पसन्द करते हैं। यह उनकी कृपा है। इसी प्रकार वे असुरों से डरते नहीं। अतएव भगवान् द्वारा पक्षपात करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥