श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 21

 
श्लोक
एतद्भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना ।
ब्रूह्येतदद्भ‍ुततमं भगवान्ह्यत्र कारणम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—इसे लेकर; भ्राम्यति—डगमगा रही है; मे—मेरी; बुद्धि:—बुद्धि; दीप-अर्चि:—दीपक की लौ; इव—सदृश; वायुना— वायु से; ब्रूहि—कृपा करके कहें; एतत्—यह; अद्भुततमम्—सर्वाधिक अद्भुत; भगवान्—समस्त ज्ञान से युक्त; हि—निश्चय ही; अत्र—यहाँ; कारणम्—कारण ।.
 
अनुवाद
 
 यह विषय निस्सन्देह अत्यन्त अद्भुत है। मेरी बुद्धि उसी तरह डगमगा रही है, जिस तरह बहती हुई वायु से दीपक की लौ विचलित हो जाती है। हे नारद मुनि, आप सब कुछ जानते हैं। कृपा करके मुझे इस अद्भुत घटना का कारण बताएँ।
 
तात्पर्य
 शास्त्रों का आदेश है—तद् विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्। जब मनुष्य जीवन की कठिन समस्याओं से आक्रान्त हो जाये तो उनको हल करने के लिए उसे नारद
अथवा परम्परागत किसी प्रतिनिधि तुल्य गुरु के पास जाना चाहिए। अतएव महाराज युधिष्ठिर ने नारद से विनती की कि वे ऐसी अद्भुत घटना का कारण बताएँ।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥