श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 25

 
श्लोक
यन्निबद्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात्प्राणिनां वध: ।
तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मन: ।
परस्य दमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसमें; निबद्ध:—बँधा हुआ; अभिमान:—मिथ्या धारणा; अयम्—यह; तत्—उस (शरीर) के; वधात्—विनाश से; प्राणिनाम्—जीवों का; वध:—विनाश; तथा—उसी प्रकार से; न—नहीं; यस्य—जिसका; कैवल्यात्—अद्वितीय या परम होने के कारण; अभिमान:—भ्रान्त धारणा; अखिल-आत्मन:—समस्त जीवों के परमात्मा का; परस्य—भगवान् का; दम-कर्तु:— परम नियन्ता; हि—निश्चय ही; हिंसा—क्षति; केन—कैसे; अस्य—उसका; कल्प्यते—सम्पन्न की जाती है ।.
 
अनुवाद
 
 देहात्मा-बुद्धि के कारण बद्धजीव सोचता है कि जब शरीर नष्ट हो जाता है, तो जीव नष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णु ही परम नियन्ता तथा समस्त जीवों के परमात्मा हैं। चूँकि उनका कोई भौतिक शरीर नहीं होता, अतएव उनमें “मैं तथा मेरा” जैसी भ्रान्त धारणा नहीं होती। अतएव यह सोचना सही नहीं है कि जब उनकी निन्दा की जाती है या उनकी स्तुति की जाती है, तो वे पीड़ा या हर्ष का अनुभव करते हैं। ऐसा कर पाना उनके लिए असम्भव है। इस प्रकार उनका न कोई शत्रु है और न कोई मित्र। जब वे असुरों को दण्ड देते हैं, तो उनकी भलाई के लिए ऐसा करते हैं और जब भक्तों की स्तुतियाँ स्वीकार करते हैं, तो वह उनके कल्याण के लिए होता है। वे न तो स्तुतियों से प्रभावित होते हैं न निन्दा से।
 
तात्पर्य
 भौतिक शरीरों से आवृत होने के कारण बड़े से बड़े विद्वान तथा मिथ्या ढंग से शिक्षित प्राचार्य समेत सारे बद्धजीव यह सोचते हैं कि ज्योंही शरीर का अन्त हो जाता है त्योंही सब कुछ समाप्त हो जाता है। यह उनकी देहात्म-बुद्धि के कारण है। कृष्ण के न तो ऐसी देहात्म-बुद्धि होती है, न ही उनका शरीर उनकी आत्मा से भिन्न है। अतएव जब कृष्ण में किसी प्रकार की देहात्म-बुद्धि है ही नहीं तो फिर वे भौतिक स्तुतियों तथ दोषारोपणों से किस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं? यहाँ पर कृष्ण के शरीर को कैवल्य कहा गया है अर्थात् उनसे अभिन्न। चूँकि हर एक के देहात्म-बुद्धि होती है अतएव यदि कृष्ण भी ऐसे ही हों तो फिर उनमें तथा बद्धजीव में क्या अन्तर हुआ? भगवद्गीता में कृष्ण के उपदेशों को निर्णायक माना जाता है, क्योंकि उनका शरीर भौतिक नहीं होता। ज्योंही भौतिक शरीर मिला नहीं कि मनुष्य में चार अवगुण आ जाते हैं, लेकिन कृष्ण के भौतिक देह न होने से उनमें ये अवगुण नहीं पाये जाते। वे सदैव आध्यात्मिक दृष्टि से चिन्मय तथा आनन्दमय रहते हैं। ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:—उनका स्वरूप शाश्वत, आनन्दपूर्ण तथा ज्ञानपूर्ण है। सच्चिदानन्द-विग्रह:, आनन्द चिन्मय-रस तथा कैवल्य एक ही हैं।
कृष्ण प्रत्येक व्यक्ति के हृदय के भीतर परमात्मा रूप में विस्तार कर सकते हैं। भगवद्गीता (१३.३) में इसकी पुष्टि हुई है। क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत—भगवान् परमात्मा हैं अर्थात् सभी जीवों की आत्मा हैं। अतएव यह स्वाभाविक रूप से निष्कर्ष निकलता है कि उनमें दोषपूर्ण देहात्म-बुद्धि नहीं पाई जाती। वे हर एक शरीर में स्थित होते हुए भी देहात्म-बुद्धि नहीं रखते। वे ऐसी धारणाओं से सदैव मुक्त रहते हैं, अतएव वे जीव के भौतिक शरीर से सम्बन्धित किसी भी वस्तु से प्रभावित नहीं हो सकते।

भगवद्गीता (१६.१९) में कृष्ण कहते हैं—

तानहं द्विषत: क्रूरान् संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥

“जो लोग ईर्ष्यालु तथा खल हैं, जो मनुष्यों में निम्नतम हैं, वे मेरे द्वारा इस भवसागर में जीवन की विविध आसुरी योनियों में डाल दिये जाते हैं।” किन्तु जब भी भगवान् असुरों जैसे मनुष्यों को दण्ड देते हैं, तो यह दण्ड इन बद्धजीवों के हित में होता है। भगवान् से ईर्ष्या करने के कारण बद्धजीव उन पर यह दोषारोपण कर सकता है कि “कृष्ण बुरे हैं, वे चोर हैं।” किन्तु कृष्ण समस्त जीवों पर दयालु होने के कारण ऐसे आरोपों पर ध्यान नहीं देते। उल्टे, वे बद्धजीवों के द्वारा अनेक बार “कृष्ण-कृष्ण” का कीर्तन करने को महत्त्व देते हैं। वे कभी-कभी ऐसे असुरों को एक जन्म में निम्नतर योनि में डालकर दण्डित करते हैं और फिर जब वे दोषारोपण करना छोड़ देते हैं, तो अगले जन्म में कृष्ण का निरन्तर कीर्तन करने के कारण उन्हें मुक्त कर दिया जाता है। परमेश्वर या उनके भक्त की निन्दा करना बद्धजीवों के लिए कभी कल्याणप्रद नहीं होता, किन्तु अत्यन्त दयालु होने के कारण कृष्ण बद्धजीवों के ऐसे पापकर्मों के लिए एक जन्म में दण्ड देते हैं और फिर उन्हें अपने धाम वापस बुला लेते हैं। इसका सजीव उदाहरण वृत्रासुर है, जो पूर्वजन्म में चित्रकेतु महाराज नामक महान् भक्त था। चूँकि उसने भक्तों के शिरोमणि शिवजी का उपहास किया, अतएव उसे वृत्र नामक असुर का शरीर धारण करना पड़ा। किन्तु बाद में उसे भगवद्धाम प्राप्त हुआ। इस तरह जब कृष्ण किसी असुर या बद्धजीव को दण्ड देते हैं, तो वे उसकी निन्दा करने की आदत छुड़ा देते हैं और जब वह पूरी तरह शुद्ध हो जाता है, तो भगवान् उसे अपने धाम बुला लेते हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥