श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 26

 
श्लोक
तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।
स्‍नेहात्कामेन वा युञ्‍ज्यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अतएव; वैर-अनुबन्धेन—निरन्तर शत्रुता से; निर्वैरेण—भक्ति से; भयेन—भय से; वा—अथवा; स्नेहात्—स्नेह से; कामेन—विषय वासनाओं से; वा—अथवा; युञ्ज्यात्—केन्द्रित करे; कथञ्चित्—किसी न किसी तरह; न—नहीं; ईक्षते— देखता है; पृथक्—अन्य कुछ ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव यदि कोई बद्धजीव किसी तरह शत्रुता या भक्ति, भय, स्नेह या विषयवासना द्वारा—इनमें से सभी या किसी एक के द्वारा—अपने मन को भगवान् पर केन्द्रित करता है, तो परिणाम एक सा मिलता है, क्योंकि अपनी आनन्दमयी स्थिति के कारण भगवान् कभी भी शत्रुता या मित्रता द्वारा प्रभावित नहीं होते।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि चूँकि कृष्ण पर अनुकूल प्रार्थनाओं या प्रतिकूल निन्दा का कोई असर नहीं होता इसलिए परमेश्वर की निन्दा ही की जाये। यह विधि-विधान नहीं है। भक्तियोग का अर्थ है—आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनम्—मनुष्य को चाहिए कि अत्यन्त अनुकूल होकर कृष्ण की सेवा करे। यही असली आदेश है। यहाँ यह कहा गया है कि यद्यपि शत्रु कृष्ण के प्रतिकूल सोचता है, किन्तु भगवान् ऐसी अभक्तिमयी सेवा से अप्रभावित रहते हैं। वे इस तरह शिशुपाल को तथा उसी भाव से शत्रुभाव रखने वाले अन्य बद्धजीवों को भी वर देते हैं। किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि मनुष्य भगवान् के प्रति शत्रुभाव रखे। यहाँ पर अनुकूल होकर भक्ति करने पर बल दिया गया है, जानबूझ कर भगवान् की निन्दा करने पर नहीं। कहा गया है—
निन्दां भगवत: शृण्वंस्तत्परस्य जनस्य वा।

ततो नापैति य: सोऽपि यात्यध: सुकृताच्च्युत: ॥

यदि कोई भगवान् या उनके भक्तों की निन्दा सुने तो उसे चाहिए कि या तो तुरन्त कार्यवाही करे या उस स्थान को छोड़ दे। अन्यथा उसे सतत नारकीय जीवन भोगना होगा। ऐसे अनेक आदेश हैं। अतएव विधान के अनुसार मनुष्य को भगवान् के प्रतिकूल नहीं होना चाहिए, अपितु सदैव उनके अनुकूल रहना चाहिए।

शिशुपाल द्वारा परमेश्वर में लीन होने की घटना भिन्न प्रकार की थी, क्योंकि अपने भौतिक जीवन के प्रारम्भ से ही जय-विजय को तीन जन्मों तक परमेश्वर को शत्रु की भाँति मानने का श्राप मिला था। उसके बाद उन्हें भगवद्धाम लौटना था। जय तथा विजय भीतर-भीतर जानते थे कि कृष्ण भगवान् हैं, लेकिन अपने उद्धार हेतु वे जानबूझ कर उनके शत्रु बने रहे। वे अपने जीवन के प्रारम्भ से ही भगवान् कृष्ण को अपना शत्रु समझने लगे थे, लेकिन उनकी निन्दा करते हुए भी शत्रुवत् विचारों के साथ-साथ वे लगातार उनका कीर्तन भी करते रहते थे। इस प्रकार वे कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने के कारण शुद्ध हो गये। यह जान लेना चाहिए कि निन्दक भी भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने से अपने पापपूर्ण कृत्यों से मुक्त हो सकता है। अतएव जो भक्त भगवान् के अनुकूल रह कर सेवा करता है उसकी मुक्ति सुनिश्चित है। अगले श्लोक से यह स्पष्ट हो जाता है। कृष्ण का एकाग्र ध्यान करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है और भौतिक जीवन से उसका उद्धार हो जाता है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने भयेन शब्द की बहुत ही सुन्दर व्याख्या की है। भयेन का अर्थ है “भय से”। जब गोपियाँ सुनसान रात्रि में कृष्ण के पास गईं तो उन्हें अपने सम्बन्धियों—अपने पतियों, भाइयों तथा पिताओं द्वारा—दण्डित होने का भय था, किन्तु उन सबकी परवाह न करती हुईं वे कृष्ण के पास गईं। भय तो था ही, किन्तु यह भय कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति को रोक नहीं पाया। मनुष्य को भूलकर भी यह नहीं सोचना चाहिए कि शिशुपाल की तरह शत्रु भाव से कृष्ण की पूजा की जानी चाहिए। आदेश यह है—आनुकूल्यस्य ग्रहणं प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्—मनुष्य को चाहिए कि में प्रतिकूल कर्म त्याग दे और अनुकूल स्थितियों को ही स्वीकार करे। सामान्यतया यदि कोई भगवान् की निन्दा करता है, तो वह दण्डित होता है। जैसाकि भगवद्गीता (१६.१९) में भगवान् कहते हैं : तानहं द्विषत: क्रूरान संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥

ऐसे अनेक आदेश हैं। मनुष्य को चाहिये कि प्रतिकूल होकर कृष्ण को न पूजे, अन्यथा उसे कम से कम एक जन्म में दण्डित होना पड़ेगा जिससे वह शुद्ध हो सके। जिस प्रकार मनुष्य को चाहिये कि वह शत्रु बाघ या सर्प का आलिंगन करके मरने का प्रयास न करे उसी तरह उसे चाहिये कि वह भगवान् की निन्दा न करे और नारकीय जीवन में जाने के लिए उनका शत्रु न बने।

इस श्लोक का उद्देश्य इस बात पर बल देना है कि भगवान् के शत्रु का भी उद्धार हो सकता है, उनके मित्र के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं। श्रील मध्वाचार्य ने भी कई प्रकार से कहा है कि मनुष्य को मनसा, वाचा, कर्मणा भगवान् विष्णु की निन्दा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि निन्दक अपने पूर्वजों सहित नारकीय जीवन का भागी होगा।

कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम्।

मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वती: समा: ॥

भगवद्गीता (१६.१९-२०) में भगवान् कहते हैं—

तानहं द्विषत: क्रूरान संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥

“जो लोग ईर्ष्यालु तथा दुर्जन हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, वे मेरे द्वारा इस संसार-सागर में जीवन की विविध आसुरी योनियों में डाल दिये जाते हैं। ऐसे लोग आसुरी योनियों में बारम्बार जन्म लेने के कारण कभी भी मुझ तक नहीं पहुँच सकते। वे धीरे-धीरे अत्यन्त निकृष्ट जीवन में धँस जाते हैं।” जो भगवान् की निन्दा करता है उसे असुरों के परिवार में डाल दिया जाता है, जिसमें भगवान् की सेवा के विस्मरण होने की पूरी-पूरी सम्भावना रहती है। भगवान् कृष्ण भगवद्गीता (९.११-१२) में आगे और भी कहते हैं—

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥

जो मूढ़ अर्थात् धूर्त हैं, वे परमेश्वर की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे मनुष्य की भाँति प्रकट होते हैं। वे भगवान् के अनन्त ऐश्वर्य को नहीं जानते।

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस:।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता: ॥

शत्रु भाव से जो कुछ भी किया जाता है, वह विफल होता है (मोघाशा:)। यदि ये शत्रु मुक्त होना चाहते हैं, या ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं, यदि वे कर्मियों की भाँति उच्च लोकों में पहुँचने के इच्छुक हैं, अथवा यदि वे भगवद्धाम को ही वापस जाना चाहते हैं, तो उन्हें निश्चित रूप से निराश होना पड़ेगा।

जहाँ तक हिरण्यकशिपु की बात है, यद्यपि वह भगवान् से अत्यधिक शत्रुता रखता था, किन्तु वह अपने पुत्र के विषय में सदैव सोचा करता था, जो एक महान् भक्त था। अतएव अपने पुत्र प्रह्लाद महाराज की कृपा से हिरण्यकशिपु का भगवान् के द्वारा उद्धार हो गया।

हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तम:।

विवक्षुरत्यगात्सूनो: प्रह्लादस्यानुभावत: ॥

निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य को शुद्ध भक्ति नहीं छोडऩी चाहिए। यहाँ तक कि निजी लाभ के लिए भी हिरण्यकशिपु या शिशुपाल का अनुकरण नहीं करना चाहिये। सफलता प्राप्त करने का यह तरीका नहीं है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥