श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 3

 
श्लोक
इति न: सुमहाभाग नारायणगुणान् प्रति ।
संशय: सुमहाञ्जातस्तद्भ‍वांश्छेत्तुमर्हति ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; न:—हमारा; सु-महा-भाग—हे भाग्यवान्:; नारायण-गुणान्—नारायण के गुणों के; प्रति—प्रति; संशय:— सन्देह; सु-महान्—अत्यन्त महान्; जात:—उत्पन्न; तत्—वह; भवान्—आप; छेत्तुम् अर्हति—कृपया दूर कर दें ।.
 
अनुवाद
 
 हे सौभाग्यशाली तथा विद्वान ब्राह्मण, यह अत्यन्त सन्देहास्पद विषय बन गया है कि नारायण पक्षपातपूर्ण हैं या निष्पक्ष हैं? कृपया निश्चित साक्ष्य द्वारा मेरे इस सन्देह को दूर करें कि नारायण सर्वदा उदासीन तथा सबों के प्रति सम हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि भगवान् नारायण परम हैं, अतएव उनके दिव्य गुणों का वर्णन एक-सा है। इस तरह उनके द्वारा दिये गये दण्ड तथा वरदान दोनों का एक-सा महत्त्व है। मूलत: उनके शत्रुतापूर्ण कार्य उनके तथाकथित शत्रुओं के प्रति शत्रुता के प्रदर्शन नहीं होते, किन्तु भौतिक जगत में लोग
सोचते हैं कि कृष्ण भक्तों के प्रति अनुकूल हैं और अभक्तों के प्रतिकूल हैं। जब भगवद्गीता में कृष्ण अन्तिम रूप से सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज का उपदेश देते हैं, तो यह केवल अर्जुन के लिए ही नहीं है अपितु इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीव के लिए है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥