श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 30

 
श्लोक
कामाद् द्वेषाद्भ‍यात्स्‍नेहाद्यथा भक्त्येश्वरे मन: ।
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गता: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
कामात्—काम से; द्वेषात्—घृणा से; भयात्—भय से; स्नेहात्—स्नेह से; यथा—तथा; भक्त्या—भक्ति से; ईश्वरे—ईश्वर में; मन:—मन; आवेश्य—लीन करके; तत्—उस; अघम्—पाप को; हित्वा—त्याग कर; बहव:—अनेक; तत्—उस; गतिम्— मुक्ति के मार्ग को; गता:—प्राप्त हुए ।.
 
अनुवाद
 
 अनेकानेक व्यक्तियों ने केवल अत्यन्त एकाग्रतापूर्वक कृष्ण का चिन्तन करके तथा पापपूर्ण कर्मों का त्याग करके मुक्ति प्राप्त की है। यह ध्यान कामवासनाओं, शत्रुतापूर्ण भावनाओं, भय, स्नेह या भक्ति के कारण हो सकता है। अब मैं यह बताऊँगा कि किस प्रकार से मनुष्य भगवान् में अपने मन को एकाग्र करके कृष्ण की कृपा प्राप्त करता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्रीमद्भागवत (१०.३३.३९) में कहा गया है—
विक्रीडि़तं ब्रजवधूभिरिदं च विष्णो: श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद्य:।

भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीर: ॥

यदि प्रामाणिक श्रोता कृष्ण व गोपियों की लीलाओं को, जो कामपूर्ण सी प्रतीत होती हैं, से सुनता है, तो उसके हृदय की कामवासना, जो बद्धजीव के हृदय रोग का कारण है, विनष्ट हो जाएगी और वह भगवान् का श्रेष्ठ भक्त बन जाएगा। यदि कोई कृष्ण के साथ गोपियों के विषयी आचरण के श्रवण मात्र से विषय-वासनाओं से मुक्त हो जाता है, तो निश्चित रूप से गोपियाँ कृष्ण के पास जाकर ऐसी समस्त इच्छाओं से मुक्त हो गईं। इसी प्रकार शिशुपाल तथा अन्य लोग जो कृष्ण से अत्यधिक ईर्ष्या करते थे और निरन्तर कृष्ण का चिन्तन करते थे ईर्ष्या से मुक्त हो गये। नन्द महाराज तथा माता यशोदा स्नेह के कारण कृष्णभावनामृत में लीन रहते थे। जब मन किसी न किसी तरह कृष्ण में पूरी तरह लीन रहता है, तो भौतिक अंश तो तुरन्त लुप्त हो जाता है और आध्यात्मिक अंश—कृष्ण का आकर्षण—प्रकट हो जाता है। इससे परोक्षत: यह पुष्टि होती है कि यदि कोई ईर्ष्यावश ही कृष्ण का चिन्तन करता है, तो मात्र चिन्तन करने के कारण वह अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और शुद्ध भक्त बन जाता है। इसके उदाहरण अगले श्लोक में दिये गये हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥