श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 35

 
श्लोक
देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम् ।
देहसम्बन्धसम्बद्धमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
देह—भौतिक शरीर की; इन्द्रिय—इन्दियाँ; असु—प्राण; हीनानाम्—जो रहित हैं उनका; वैकुण्ठ-पुर—वैकुण्ठ के; वासिनाम्—निवासियों का; देह-सम्बन्ध—भौतिक शरीर में; सम्बद्धम्—बन्धन; एतत्—यह; आख्यातुम् अर्हसि—कृपया वर्णन करें ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठवासियों के शरीर पूर्णतया आध्यात्मिक होते हैं, उनको भौतिक शरीर से, इन्द्रियों या प्राण से कुछ लेना-देना नहीं रहता। अतएव कृपा करके बताइये कि किस तरह भगवान् के पार्षदों को सामान्य व्यक्तियों की तरह भौतिक शरीर में अवतरित होने का श्राप दिया गया?
 
तात्पर्य
 इस अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दे पाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन होगा किन्तु महाजन होने के कारण नारद मुनि इसका उत्तर दे सकते थे। अतएव महाराज युधिष्ठिर ने उनसे यह कहकर—एतद् आख्यातुम् अर्हसि—कि आप ही इसका कारण बता सकते हैं, प्रश्न पूछा। प्रामाणिक स्रोतों से पता चल सकता है कि भगवान् विष्णु के जो पार्षद इस वैकुण्ठ लोक से नीचे आते हैं, वे वास्तव में पतित नहीं होते। वे भगवान् की इच्छा पूरी करने के लिए इस भौतिक जगत में अवतरित होते हैं और उनका इस प्रकार का अवतरण भगवान् के ही समान होता है। भगवान् इस भौतिक जगत में अपनी अन्तरंगा शक्ति के माध्यम से आते हैं। इसी प्रकार जब भगवद्भक्त या भगवान् का पार्षद इस जगत में अवतरित होता है, तो वह आध्यात्मिक शक्ति के बल पर ऐसा करता है। भगवान् द्वारा सम्पन्न कोई भी लीला योगमाया द्वारा व्यवस्थित की जाती है, महामाया द्वारा नहीं। अतएव यह समझना चाहिए कि जब जय तथा विजय इस भौतिक जगत में अवतरित हुए तो वे इसलिए आये, क्योंकि उन्हें भगवान् के लिये कुछ करना था। अन्यथा यह तथ्य है कि कोई भी वैकुण्ठ से नीचे पतित नहीं होता। निस्सन्देह, जो जीव सायुज्य मुक्ति का इच्छुक है, वह कृष्ण के ब्रह्मतेज में रहता जाता है, जो कृष्ण के शरीर पर आश्रित है (ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम् )। ऐसी निर्विशेषवादी का जो ब्रह्मतेज की शरण ग्रहण करता है पतन अवश्यम्भावी है। इसका उल्लेख शास्त्र (भागवत १०.२.३२) में हुआ है— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्।
त्वय्यस्तभावाद् अविशुद्धबुद्धय:।

आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं तत: पतन्त्यधोऽनादृतयुस्मदङ्घ्रय: ॥

“हे भगवान्! उनकी बुद्धि अशुद्ध है, जो अपने को मुक्त तो मानते हैं, किन्तु जिनमें भक्ति नहीं होती। भले ही वे कठोर तपस्या द्वारा सर्वोच्च बिन्दु को क्यों न प्राप्त कर लें, वे इस भौतिक जगत में पुन: अवश्य गिरते हैं, क्योंकि वे आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण नहीं करते।” चूँकि निर्विशेषवादी भगवान् का पार्षद बनने वैकुण्ठ लोक तक नहीं पहुँच पाते, अतएव उनकी इच्छाओं के अनुसार कृष्ण उन्हें सायुज्य मुक्ति प्रदान करते हैं। फिर भी, चूँकि सायुज्य मुक्ति अधूरी मुक्ति है, अतएव वे इस जगत में फिर आ गिरते हैं। जब यह कहा जाता है कि कोई जीवात्मा ब्रह्मलोक से च्युत होता है, तो यह निर्विशेषवादी पर लागू होता है।

प्रामाणिक स्रोतों से पता चलता है कि जय-विजय को इस भौतिक जगत में भगवान् की युद्ध करने की इच्छा-पूर्ति के लिये भेजा गया था। भगवान् को भी कभी-कभी युद्ध करने की इच्छा होती है, किन्तु भगवान् के परम विश्वसनीय भक्त के अतिरिक्त उनसे कौन युद्ध कर सकता है? जय-विजय भगवान् की इच्छा-पूर्ति के लिये ही इस जगत में अवतरित हुए। अतएव उनके तीनों जन्मों में सर्वप्रथम हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु के रूप में, फिर रावण तथा कुम्भकर्ण के रूप में और अन्त में शिशुपाल तथा दन्तवक्र के रूप में उन्हें भगवान् ने अपने हाथों से मारा। दूसरे शब्दों में, जय-विजय नामक भगवान् के पार्षद भगवान् की युद्ध करने की इच्छा पूरी करने के लिए इस भौतिक जगत में अवतरित हुए। अन्यथा जैसाकि महाराज युधिष्ठिर कहते हैं—अश्रद्धेय इवाभाति—कि भगवान् का दास वैकुण्ठ से नीचे गिरता है अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इस जगत में जय-विजय किस प्रकार आये इसकी विवेचना नारद मुनि द्वारा आगे की गई है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥