श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 37

 
श्लोक
पञ्चषड्ढायनार्भाभा: पूर्वेषामपि पूर्वजा: ।
दिग्वासस: शिशून् मत्वा द्वा:स्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
पञ्च-षट्-धा—पाँच या छ: वर्ष; आयन—लगभग; अर्भ-आभा:—बालकों जैसे; पूर्वेषाम्—ब्रह्माण्ड के पुराने लोग (मरीचि तथा अन्य); अपि—यद्यपि; पूर्व-जा:—पहले उत्पन्न; दिक्-वासस:—नंगे होने से; शिशून्—बच्चे; मत्वा—सोचकर; द्वा: स्थौ—दो द्वारपालों, जय तथा विजय ने; तान्—उनको; प्रत्यषेधताम्—मना किया ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि ये चारों महर्षि मरीचि आदि ब्रह्मा के अन्य पुत्रों की अपेक्षा बड़े थे, किन्तु वे पाँच या छ: वर्ष के छोटे-छोटे नंगे बच्चों जैसे प्रतीत हो रहे थे। जय तथा विजय नामक इन द्वारपालों ने जब उन्हें वैकुण्ठलोक में प्रवेश करने का प्रयास करते देखा तो सामान्य बच्चे समझ कर उन्हें प्रवेश करने से मना कर दिया।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में श्रील मध्वाचार्य अपने ग्रंथ तन्त्र सार में कहते हैं—
द्वा:स्थावित्यनेनाधिकार-स्थत्वमुक्तम्- अधिकारस्थिताश्चैव विमुक्तश्च द्विधा जना:।

विष्णुलोकस्थितास्तेषां वरशापादियोगिन: ॥

अधिकारस्थितां मुक्तिं नियतं प्राप्नुवन्ति च।

विमुक्त्यनन्तरं तेषां वर शापादयो ननु ॥

देहेन्द्रियासुयुक्तश्च पूर्वं पश्चान्न तैर्युता:।

अप्यभिमानिभिस्तेषां देवै स्वात्मोत्तमैर्युता: ॥

सारांश यह है कि वैकुण्ठलोक में भगवान् विष्णु के निजी पार्षद सदैव मुक्तात्माएँ हैं। यदि कभी उन्हें वर प्राप्त होता है या शाप दिया जाता है, तो भी वे सदैव मुक्त रहते हैं और वे प्रकृति के भौतिक गुणों से कभी कलुषित नहीं होते। वैकुण्ठलोक में मुक्ति के पूर्व उन्हें भौतिक शरीर प्राप्त थे, किन्तु एक बार वैकुण्ठलोक आ जाने पर उनके वे शरीर नहीं रहे। अतएव भगवान् विष्णु के पार्षदों को यदि कभी शापवश अवतरित होना पड़ता है, तो भी वे सदैव मुक्त रहते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥