श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 45

 
श्लोक
तत्रापि राघवो भूत्वा न्यहनच्छापमुक्तये ।
रामवीर्यं श्रोष्यसि त्वं मार्कण्डेयमुखात्प्रभो ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र अपि—तत्पश्चात्; राघव:—भगवान् रामचन्द्र के रूप में; भूत्वा—प्रकट होकर; न्यहनत्—वध किया; शाप-मुक्तये—शाप- मुक्त करने के लिए; राम-वीर्यम्—भगवान् राम का पराक्रम; श्रोष्यसि—सुनोगे; त्वम्—तुम; मार्कण्डेय-मुखात्—ऋषि मार्कण्डेय के मुख से; प्रभो—हे प्रभु ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा, जय तथा विजय को ब्राह्मणों के शाप से मुक्त करने के लिए भगवान् रामचन्द्र रावण तथा कुम्भकर्ण का वध करने के लिए प्रकट हुए। अच्छा होगा कि तुम भगवान् रामचन्द्र के कार्यकलापों के विषय में मार्कण्डेय से सुनो।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥