श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 46

 
श्लोक
तावत्र क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।
अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
तौ—दोनों; अत्र—यहाँ, तीसरे जन्म में; क्षत्रियौ—क्षत्रिय अथवा राजा; जातौ—उत्पन्न; मातृ-स्वसृ-आत्म-जौ—मौसी के पुत्र; तव—तुम्हारी; अधुना—अब; शाप-निर्मुक्तौ—शाप से मुक्त; कृष्ण-चक्र—कृष्ण के चक्र द्वारा; हत—विनष्ट; अंहसौ—जिसके पाप ।.
 
अनुवाद
 
 तीसरे जन्म में वही जय तथा विजय क्षत्रियों के कुल में तुम्हारी मौसी के पुत्रों के रूप में तुम्हारे मौसरे भाई बने हैं। चूँकि भगवान् कृष्ण ने उनका वध अपने चक्र से किया है, अतएव उनके सारे पाप नष्ट हो चुके हैं और अब वे शाप से मुक्त हैं।
 
तात्पर्य
 अपने अन्तिम जन्म में जय तथा विजय राक्षस नहीं बने, अपितु उन्होंने सुप्रसिद्ध क्षत्रिय कुल में जन्म लिया जिसका सम्बन्ध कृष्ण के परिवार से था। वे भगवान् कृष्ण के मौसेरे भाई बने और लगभग उन्हीं के समान पद पर थे। भगवान् ने स्वयं अपने चक्र द्वारा
उन्हें मार कर ब्राह्मणों के शाप से बचे हुए पापों को भी नष्ट कर दिया। नारद मुनि ने महाराज युधिष्ठिर को बताया कि शिशुपाल भगवान् कृष्ण के शरीर में प्रवेश करके उनके पार्षद के रूप में पुन: वैकुण्ठ लोक में प्रविष्ट हुआ। इस घटना को सबों ने देखा था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥