श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 47

 
श्लोक
वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम् ।
नीतौ पुनर्हरे: पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
वैर-अनुबन्ध—घृणा का बन्धन; तीव्रेण—तीव्र; ध्यानेन—ध्यान से; अच्युत-सात्मताम्—अच्युत भगवान् के तेज को; नीतौ— प्राप्त किया; पुन:—फिर; हरे:—हरि का; पार्श्वम्—सान्निध्य; जग्मतु:—वे पहुँचे; विष्णु-पार्षदौ—भगवान् विष्णु के द्वारपाल पार्षद ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु के ये दोनों पार्षद, जय तथा विजय, दीर्घकाल तक शत्रुता का भाव बनाये रहे। इस प्रकार कृष्ण के विषय में सदैव चिन्तन करते रहने से भगवद्धाम जाने पर उन्हें पुन: भगवान् की शरण प्राप्त हो गई।
 
तात्पर्य
 जय-विजय चाहे जिस अवस्था में रहे हों, किन्तु वे सदैव कृष्ण का स्मरण करते रहे। अतएव मौषल लीला के अन्त में ये दोनों पार्षद कृष्ण के पास लौट गये। कृष्ण के शरीर तथा नारायण के शरीर में कोई अन्तर नहीं है। अतएव देखने में यद्यपि वे कृष्ण के शरीर
में प्रविष्ट हुए किन्तु वास्तव में वे विष्णु के द्वारपालों के रूप में वैकुण्ठ लोक में पुन: प्रविष्ट हुए। वे कृष्ण के शरीर से होकर वैकुण्ठ लोक लौटे, यद्यपि ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्हें कृष्ण के शरीर में सायुज्य मुक्ति प्राप्त हुई।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥