श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 9

 
श्लोक
ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।
विदन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्तत: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
ज्योति:—अग्नि; आदि:—तथा अन्य तत्त्व; इव—सदृश; आभाति—प्रतीत होती हैं; सङ्घातात्—देवताओं तथा अन्यों के शरीरों से; न—नहीं; विविच्यते—पहचाने जाते हैं; विदन्ति—अनुभव करते हैं; आत्मानम्—परमात्मा को; आत्म-स्थम्—हृदय में स्थित; मथित्वा—विलग करके; कवय:—दक्ष चिन्तक; अन्तत:—भीतर ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वव्यापी भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित रहते हैं और एक कुशल चिन्तक ही अनुभव कर सकता है कि वे अधिक या न्यून मात्रा में कैसे वहाँ उपस्थित हैं। जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि, जलपात्र में जल या घड़े के भीतर आकाश को समझा जा सकता है उसी प्रकार जीव की भक्तिमयी क्रियाओं को देखकर यह समझा जा सकता है कि वह जीव असुर है या देवता। विचारशील व्यक्ति किसी मनुष्य के कर्मों को देखकर यह समझ सकता है कि उस मनुष्य पर भगवान् की कितनी कृपा है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१०.४१) में भगवान् कहते हैं—
यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमद् ऊर्जितमेव वा।

तद् तद् एवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥

“यह जान लो कि सारी सुन्दर, यशस्वी तथा बलशाली सृष्टियाँ मेरे तेज के केवल एक स्फुलिंग से उत्पन्न होती हैं।” हमें यह व्यावहारिक अनुभव है कि एक व्यक्ति अद्भुत से अद्भुत कार्य कर लेता है, किन्तु दूसरा व्यक्ति उन्हीं कार्यों को और यहाँ तक कि ऐसे कार्यों को जिसमें थोड़े से सामान्य ज्ञान की आवश्यकता होती है नहीं कर पाता। अतएव भगवान् ने किसी भक्त का कितना पक्ष-समर्थन किया है, वह भक्त द्वारा सम्पन्न कार्यों से ही आँका जा सकता हैं। भगवद्गीता (१०.१०) में भगवान् यह भी कहते हैं—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो लोग निरन्तर मेरी भक्ति करते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।” यह अत्यन्त व्यावहारिक है। शिक्षक द्वारा शिष्य को शिक्षा देना तभी सार्थक है जब वह उन शिक्षाओं को अधिकाधिक ग्रहण कर सके। अन्यथा शिक्षक द्वारा शिक्षा दिये जाने पर भी वह अपनी विद्या में कोई प्रगति नहीं कर पाता। इससे पक्षपात का प्रश्न ही नहीं उठता। जब कृष्ण कहते हैं—तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तम् तब यह सूचित होता है कि कृष्ण हर एक को भक्तियोग प्रदान करने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन मनुष्य को उसे ग्रहण करने में समर्थ होना चाहिए। यही रहस्य है। इस प्रकार जब कोई व्यक्ति अद्भुत भक्तिमय कार्यकलाप करता है, तो विचारवान व्यक्ति समझते हैं कि भगवान् कृष्ण इस भक्त पर अधिक अनुकूल हैं।

इसे समझ पाना कठिन नहीं है, लेकिन ईर्ष्यालु लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं होते कि भगवान् ने भक्त की उन्नत स्थिति के कारण ही उस पर कृपा की है। ऐसे मूर्ख ईर्ष्या करने लगते हैं और प्रगत भक्त के कार्यों का अवमूल्यन करने का प्रयास करते हैं। यह वैष्णवता नहीं है। वैष्णव को चाहिए कि अन्य वैष्णव द्वारा की गई भगवत्सेवा की प्रशंसा करे। इसीलिए श्रीमद्भागवत में वैष्णव को निर्मत्सर कहा गया है। वैष्णवजन न तो अन्य वैष्णवों से कभी ईर्ष्या करते हैं, न अन्य किसी से भी।

इसीलिए वे निर्मत्सराणां सताम् कहलाते हैं।

जैसाकि भगवद्गीता से सूचित होता है, मनुष्य यह समझ सकता है कि वह किस तरह सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण से संतृप्त होता है। यहाँ पर जो उदाहरण दिये गये हैं उनमें से अग्नि सत्त्वगुण की द्योतक है। हम अग्नि के परिमाण से काष्ठ, पेट्रोल या अन्य ज्वलनशील पदार्थों की संरचना समझ सकते हैं। इसी प्रकार जल रजोगुण का द्योतक है। हमारी क्षुद्र त्वचा में तथा विशाल अटलांटिक सागर दोनों ही में जल है और किसी पात्र में जल की मात्रा देखकर पात्र के आकार का अनुमान लगाया जा सकता है। आकाश तमोगुण का द्योतक है। आकाश एक छोटे से घड़े में भी है और अन्तरिक्ष में भी। इस प्रकार उचित न्याय द्वारा सत्त्व, रजो तथा तमोगुण की मात्रा के अनुसार यह देखा जा सकता है कि कौन देवता है और कौन असुर और कौन यक्ष या राक्षस है। केवल देखकर कोई व्यक्ति देवता, असुर या राक्षस को नहीं पहचान सकता, अपितु एक विवेकशील व्यक्ति ऐसे व्यक्ति द्वारा सम्पन्न कार्यकलापों से ही उसे समझ पाता है। पद्मपुराण में सामान्य वर्णन मिलता है—विष्णुभक्त: स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्यय:। विष्णु का भक्त देवता होता है, जबकि असुर या यक्ष इसका ठीक उल्टा होता है। असुर भगवान् विष्णु का भक्त नहीं होता, अपितु अपनी इन्द्रिय-तृप्ति के लिए वह देवताओं, भूतों, प्रेतों इत्यादि का भक्त होता है। इस प्रकार देवता, राक्षस तथा असुर का निर्णय उनके कार्यकलापों से किया जा सकता है।

इस श्लोक में आत्मानम् शब्द का अर्थ परमात्मानम् है। परमात्मा सबों के अन्त:करण में स्थित हैं (अन्तत:)। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१८.६१) में हुई है। ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित होने के कारण ईश्वर हर एक को उसके द्वारा उपदेश ग्रहण करने की क्षमता के अनुसार निर्देशन करते हैं। भगवद्गीता के उपदेश सबों के लिए खुले हुए हैं, किन्तु कुछ लोग उन्हें ठीक से समझते हैं जब कि कुछ लोग इतने बेढंगेपन से समझते हैं कि वे कृष्ण के अस्तित्व पर ही विश्वास नहीं कर पाते, यद्यपि वे कृष्ण की पुस्तक पढ़ते होते हैं। यद्यपि गीता कहती है श्रीभगवान् उवाच अर्थात् “कृष्ण ने कहा” किन्तु वे कृष्ण को नहीं समझ पाते। यह उनका दुर्भाग्य या उनकी अक्षमता है, जो रजोगुण तथा तमोगुण के द्वारा उत्पन्न होती है। इन्ही गुणों के कारण वे कृष्ण को समझ तक नहीं पाते जबकि अर्जुन जैसा प्रगत भक्त उन्हें समझता है और यह कहकर उनका गुणगान करता है—परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्—आप परब्रह्म हैं, परम धाम तथा परम पवित्र करने वाले हैं। कृष्ण सबों के लिए प्रकट हैं, किन्तु उन्हें समझने की क्षमता होना आवश्यक है। बाह्य लक्षणों के आधार पर कोई यह नहीं समझ सकता कि भगवान् की कृपा किस पर है और किस पर नहीं। मनुष्य की मनोवृत्ति के अनुसार ही कृष्ण उसके प्रत्यक्ष उपदेशक बनते हैं, अथवा उसके लिए अज्ञात रहते हैं। यह कृष्ण का पक्षपात नहीं है, अपितु उन्हें समझ पाने की क्षमता के प्रति उनकी अनुक्रिया है। मनुष्य की ग्राहकता के अनुसार, चाहे वह देवता हो, असुर हो अथवा यक्ष या राक्षस, कृष्ण के गुण उसी अनुपात से प्रकट होते हैं। किन्तु जो अल्पज्ञ हैं, वे कृष्ण की शक्ति के इस आनुपातिक प्रदर्शन (प्राकट्य) को कृष्ण का पक्षपात समझते हैं, परन्तु वास्तव में यह बात ऐसी नहीं है। कृष्ण सबों पर समभाव रखते हैं और कृष्ण-कृपा को ग्रहण करने की क्षमता के अनुसार ही मनुष्य कृष्णभावनामृत में प्रगति करता है। इस सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। आकाश में अनेक तारे होते हैं। रात्रि में, यहाँ तक कि अँधेरे में भी, चन्द्रमा अत्यधिक प्रकाशमान रहता है और प्रत्यक्ष दिखता है। सूर्य भी अत्यधिक प्रकाशमान है। किन्तु बादल से आच्छादित होने पर ये ज्योतिपिंड नहीं दिखते। इसी प्रकार ज्यों-ज्यों सत्तवगुण में वृद्धि होती जाती है त्यों-त्यों भक्ति के कारण उसका तेज अधिकाधिक दिखता है, किन्तु जो जितना ही रजो तथा तमो गुणों से आच्छादित होता है, उसका तेज उतना ही कम दृष्टिगोचर होता है। किसी के गुणों का प्राकट्य भगवान् के पक्षपात पर नहीं निर्भर करता, अपितु विभिन्न आवरणों की मात्रा पर निर्भर करता है। इस तरह यह पता चल सकता है कि कोई सत्त्वगुण में कितना अग्रसर है और कितना रजो तथा तमो गुणों से आवृत है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥