श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में महाराज परीक्षित के एक प्रश्न के उत्तर में शुकदेव गोस्वामी अपना निर्णय देते हैं कि किस तरह भगवान् ने परमात्मा, सखा तथा हरेक के रक्षक होते हुए भी, स्वर्ग के राजा इन्द्र के निमित्त दैत्यों का वध किया। वे अपने कथनों में उन लोगों के तर्कों का पूरी तरह खंडन करते हैं, जो भगवान् पर पक्षपात करने का दोषारोपण करते हैं। शुकदेव गोस्वामी सिद्ध करते हैं कि चूँकि बद्धजीव का शरीर प्रकृति के तीन गुणों से संदूषित है, अतएव उसमें शत्रुता तथा मित्रता, आसक्ति तथा विरक्ति जैसे द्वैत भावों का उदय होना स्वाभाविक है। किन्तु परमेश्वर में इस प्रकार के द्वैत भाव नहीं होते। यहाँ तक कि शाश्वत काल भी भगवान् के कार्यकलापों को नियंत्रित नहीं कर सकता। शाश्वत काल भगवान् द्वारा ही सृजित है, अतएव वह उन्हीं के वशीभूत होकर कार्य करता रहता है। भगवान् सदैव प्रकृति के गुणों के प्रभाव अर्थात् अपनी उस बहिरंगा शक्ति माया के प्रभाव से परे रहते हैं, जो सृष्टि तथा प्रलय का कार्य करती है। इस तरह परमेश्वर द्वारा मारे गये सारे दैत्य या असुर तुरन्त ही मोक्ष-लाभ करते हैं।
परीक्षित महाराज द्वारा पूछा गया दूसरा प्रश्न शिशुपाल के विषय में है कि यद्यपि वह कृष्ण के बचपन से ही उनके प्रति शत्रु-भाव रखता था तथा कृष्ण की निन्दा किया करता था फिर भी जब कृष्ण ने उसका वध किया तो वह कृष्ण में लीन होकर मोक्ष पा गया। शुकदेव गोस्वामी बताते हैं कि भक्तों के चरणों पर अपराध करने के कारण वैकुण्ठ में भगवान् के दो द्वारपाल, जिनके नाम जय तथा विजय थे, सत-युग में हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष बने। फिर अगले युग—त्रेतायुग—में वे ही रावण तथा कुम्भकर्ण बने और द्वापर युग के अन्त में शिशुपाल तथा दन्तवक्र बने। अपने सकाम कर्मों से जय तथा विजय ने भगवान् के शत्रु बने रहना स्वीकार किया और जब उसी मनोवृत्ति में उनका वध हुआ तो उन्हें सायुज्य मोक्ष प्राप्त हुआ। इस तरह यदि कोई ईर्ष्यावश भी भगवान् का चिन्तन करता है, तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है। तो फिर उन भक्तों के विषय में क्या कहा जाये जो प्रेम तथा श्रद्धापूर्वक भगवान् की सेवा में निरन्तर लगे रहते हैं?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥