श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
भक्तियोगस्य तत्सर्वमन्तरायतयार्भक: ।
मन्यमानो हृषीकेशं स्मयमान उवाच ह ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; भक्ति-योगस्य—भक्ति के नियमों का; तत्—वे (नृसिंहदेव द्वारा दिये गये वर); सर्वम्—उनमें से प्रत्येक; अन्तरायतया—अवरोध के होने से (भक्तियोग के पथ पर); अर्भक:—बालक रूप प्रह्लाद महाराज; मन्यमान:—मानते हुए; हृषीकेशम्—नृसिंहदेव को; स्मयमान:—मुसकाते हुए; उवाच—कहा; ह—भूतकाल का सूचक ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : यद्यपि प्रह्लाद महाराज बालक थे किन्तु जब उन्होंने नृसिंहदेव द्वारा दिये गये वरों को सुना तो उन्होंने इन्हें भक्ति के मार्ग में अवरोध समझा। तब वे विनीत भाव से मुसकाये और इस तरह बोले।
 
तात्पर्य
 भक्ति का परम लक्ष्य भौतिक उपलब्धियाँ नहीं है, अपितु ईश-प्रेम है। इसलिए प्रह्लाद महाराज, ध्रुव महाराज, अम्बरीष महाराज, युधिष्ठिर महाराज तथा अनेक भक्त राजाओं ने अत्यन्त ऐश्वर्यवान् होते हुए भी भगवान् की सेवा में इस ऐश्वर्य को लगाया, अपनी इन्द्रिय-तृप्ति में नहीं। निस्सन्देह, भौतिक ऐश्वर्य का स्वामित्व सदैव भयावह है क्योंकि भौतिक ऐश्वर्य के वशीभूत होकर मनुष्य भक्ति से पथभ्रष्ट हो सकता है। तो भी
शुद्ध भक्त कभी भी भौतिक ऐश्वर्य से भ्रमित नहीं होता (अन्याभिलाषिता शून्यम् )। उल्टे, उसके पास जो कुछ भी रहता है उसे वह शत-प्रतिशत भगवान् की सेवा में लगाता है। जब कोई भौतिक सम्पत्ति से आकृष्ट होता है, तो इस सम्पत्ति को माया द्वारा प्रदत्त माना जाता है, किन्तु जब वह इस सम्पत्ति का पूरा उपयोग सेवा में करता है, तो उसे ईश्वर का उपहार या भक्ति को सम्वर्धित करने के लिए कृष्ण-प्रदत्त सुविधा माना जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥