श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 11

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
नैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिष
आशासतेऽमुत्र च ये भवद्विधा: ।
तथापि मन्वन्तरमेतदत्र
दैत्येश्वराणामनुभुङ्‌क्ष्व भोगान् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; न—नहीं; एकान्तिन:—अनन्य भक्ति के अतिरिक्त और किसी इच्छा से विहीन; मे— मुझसे; मयि—मुझमें; जातु—किसी समय; इह—इस संसार में; आशिष:—वरदान; आशासते—आन्तरिक इच्छा; अमुत्र— अगले जीवन में; च—तथा; ये—जो भक्त; भवत्-विधा:—आपकी तरह; तथापि—फिर भी; मन्वन्तरम्—एक मनु की आयु तक; एतत्—यह; अत्र—इस संसार में; दैत्य-ईश्वराणाम्—भौतिकतावादी मनुष्यों के ऐश्वर्यों का; अनुभुङ्क्ष्व—भोग कर सकते हो; भोगान्—सभी भौतिक ऐश्वर्यों को ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे प्रिय प्रह्लाद, तुम जैसा भक्त न तो इस जीवन में, न ही अगले जीवन में किसी प्रकार के भौतिक ऐश्वर्य की कामना करता है। तो भी मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि तुम इस मन्वन्तर तक असुरों के राजा के रूप में इस भौतिक जगत में उनके ऐश्वर्य का भोग करो।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक मनु की आयु एकहत्तर युग चक्र की अनधि के तुल्य परिगणित की जाती है, जिसमें प्रत्येक युग ४३००००० वर्ष के समान होता है। यद्यपि नास्तिक लोग भौतिक ऐश्वर्य का भोग करना चाहते हैं और बड़े जोर-शोर से बड़े-बड़े आवास, सडक़ें, शहर तथा कारखाने बनवाने का प्रयास करते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश, वे अस्सी, नब्बे वर्ष या बहुत हुआ तो एक सौ वर्षों से अधिक जीवित नहीं रह सकते। यद्यपि भौतिकतावादी व्यक्ति व्यामोह का साम्राज्य बनाने में इतना श्रम करता है लेकिन वह कुछ वर्षों से अधिक तक उसका भोग नहीं कर पाता। फिर भी चूँकि प्रह्लाद महाराज भक्त थे, अतएव भगवान् ने उन्हें भौतिकतावादियों के राजा के रूप में ऐश्वर्य-भोग करने की अनुमति प्रदान कर दी। प्रह्लाद महाराज ने हिरण्यकशिपु के परिवार में जन्म लिया था, जो सर्वोच्च भौतिकतावादी था और चूँकि प्रह्लाद अपने पिता के प्रामाणिक उत्तराधिकारी थे, अतएव भगवान् ने उन्हें अपने पिता द्वारा बनाये गये साम्राज्य पर इतने वर्षों तक भोग करने की अनुमति प्रदान की जिसकी गणना किसी भी भौतिकतावादी व्यक्ति के लिए कर पाना असम्भव है। भक्त को भौतिक ऐश्वर्य की कामना नहीं करनी होती, किन्तु यदि वह शुद्ध भक्त होता है, तो बिना किसी प्रयास के उसे भौतिक सुख-भोग करने का पर्याप्त अवसर प्राप्त होता है। अतएव हर एक को सलाह दी जाती है कि वह सभी परिस्थितियों में भक्ति करे। यदि कोई भौतिक ऐश्वर्य चाहता है, तो वह शुद्ध भक्त भी बन सकता है और इस तरह उसकी इच्छापूर्ति हो जाएगी। श्रीमद्भागवत (२.३.१०) में कहा गया है—
अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥

“चाहे कोई कुछ चाहे या नहीं अथवा वह भगवान् में तदाकार होना चाहे, तभी तो वह तभी बुद्धिमान है। यदि वह भगवान् की दिव्य सेवा द्वारा उनकी पूजा करता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥