श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 31

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
इत्युक्त्वा भगवान् राजंस्ततश्चान्तर्दधे हरि: ।
अद‍ृश्य: सर्वभूतानां पूजित: परमेष्ठिना ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; इति उक्त्वा—ऐसा कहकर; भगवान्—भगवान्; राजन्—हे राजा युधिष्ठिर; तत:—उस स्थान से; च—भी; अन्तर्दधे—अन्तर्धान हो गये; हरि:—भगवान् हरि; अदृश्य:—अदृश्य; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों के द्वारा; पूजित:—पूजे जाकर; परमेष्ठिना—ब्रह्मा द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा युधिष्ठिर, ब्रह्मा को उपदेश देते हुए सामान्य व्यक्ति को न दिखने वाले भगवान् इस तरह बोले। तब ब्रह्मा द्वारा पूजित होकर भगवान् उस स्थान से अदृश्य हो गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥