श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 46

 
श्लोक
य एतत्पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वीर्योपबृंहितम् ।
कीर्तयेच्छ्रद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; एतत्—इस; पुण्यम्—पवित्र; आख्यानम्—कथा को; विष्णो:—भगवान् विष्णु की; वीर्य—परम शक्ति; उपबृंहितम्—के वर्णन से युक्त; कीर्तयेत्—कीर्तन करता या दुहराता है; श्रद्धया—अतीव श्रद्धापूर्वक; श्रुत्वा—उचित स्रोत से सुन कर; कर्म-पाशै:—सकाम कर्मों के बन्धन से; विमुच्यते—छूट जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जो कोई भगवान् विष्णु की सर्वव्यापकता विषयक इस कथा को सुनता है और इसका कीर्तन करता है, वह निश्चित रूप से भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥