श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 57

 
श्लोक
अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभु: ।
शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; अनुगृह्य—उन पर कृपा करके; भगवान्—अत्यन्त शक्तिशाली; मा—मत; भैष्ट—डरो; इति—इस प्रकार; सुरान्—देवताओं को; विभु:—शिवजी ने; शरम्—बाण; धनुषि—धनुष पर; सन्धाय—चढ़ाकर; पुरेषु—असुरों से युक्त उन तीनों आवासों में; अस्त्रम्—अस्त्र; व्यमुञ्चत—छोड़ा ।.
 
अनुवाद
 
 अत्यन्त शक्तिशाली एवं समर्थ शिवजी ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए कहा “डरो मत।” तब उन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर असुरों द्वारा निवसित तीनों आवासों की ओर छोड़ा।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥