श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 59

 
श्लोक
तै: स्पृष्टा व्यसव: सर्वे निपेतु: स्म पुरौकस: ।
तानानीय महायोगी मय: कूपरसेऽक्षिपत् ॥ ५९ ॥
 
शब्दार्थ
तै:—उन (बाणों) के द्वारा; स्पृष्टा:—स्पर्श किये जाने या आक्रमण किये जाने से; व्यसव:—निष्प्राण; सर्वे—सारे असुर; निपेतु:—गिर पड़े; स्म—पूर्वकाल में; पुर-ओकस:—उपर्युक्त तीनों आवासरूपी विमानों के निवासी होने के कारण; तान्—उन सबों को; आनीय—लाकर; महा-योगी—महान् योगी; मय:—मय दानव ने; कूप-रसे—अमृत के कुएँ में (जिसे महायोगी मय ने बनाया था); अक्षिपत्—रख दिया ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी के सुनहरे बाणों से आक्रमण किये जाने से उन तीनों आवासों के निवासी असुर निष्प्राण होकर गिर पड़े। तब परम योगी मय दानव ने उन्हें अपने द्वारा निर्मित अमृत कूप में लाकर डाल दिया।
 
तात्पर्य
 सामान्यतया असुरगण अपनी योगशक्ति के कारण अत्यन्त शक्तिशाली होते हैं। किन्तु जैसाकि भगवान् कृष्ण भगवद्गीता (६.४७) में कहते हैं—
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान भजते यो मां स मे युक्ततमो मत: ॥

“समस्त योगियों में से जो योगी अत्यन्त श्रद्धा पूर्वक मेरी शरण में रहता है और भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करता है, वह योग में घनिष्ठतापूर्वक मुझसे युक्त रहता है और सर्वोच्च होता है।” योगी का असली उद्देश्य भगवान् कृष्ण पर अपने ध्यान को पूरी तरह केन्द्रित करना और सदैव उन्हीं का चिन्तन करना है (मद्गतेनान्तरात्मना )। ऐसी सिद्धि-लाभ के लिए मनुष्य को हठ योग करना होता है और तब इस योग से अभ्यासकर्ता को किञ्चित अपूर्व योगशक्ति प्राप्त होती है। किन्तु असुरगण कृष्ण के भक्त न बनकर इस योगशक्ति का उपयोग अपनी इन्द्रिय-तृप्ति के लिए करते हैं। उदाहरणार्थ, यहाँ पर मय दानव को महायोगी कहा गया है किन्तु उसका कार्य असुरों की सहायता करना था। आजकल देखा जाता है कि कुछ ऐसे योगी हैं, जो भौतिकतावादियों को इन्द्रियों की तृप्ति कराते हैं और ऐसे वञ्चक हैं, जो अपने आपको ईश्वर के रूप में विज्ञापित करते हैं। मय दानव ऐसा ही व्यक्ति था, जो असुरों का देवता था और वह कुछ आश्चर्यजनक करामातें कर सकता था जिनमें से एक का वर्णन यहाँ हुआ है— उसने अमृत से पूर्ण एक कुँआ बनाया और असुरों को लाकर उसी में डाल दिया। यह अमृत मृत सञ्जीवयितरि कहलाता था, क्योंकि इससे मृत शरीर जीवित हो सकता था। मृतसञ्जीवयितरि एक आयुर्वेदिक दवा भी है। यह एक प्रकार का आसव है, जो मरणासन्न व्यक्ति में जीवन ला देता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥