श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 6

 
श्लोक
अहं त्वकामस्त्वद्भ‍क्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रय: ।
नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अहम्—जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है; तु—निस्सन्देह; अकाम:—निष्काम; त्वत्-भक्त:—निष्काम भाव से आपके प्रति पूर्णतया आसक्त; त्वम् च—आप भी; स्वामी—असली मालिक; अनपाश्रय:—निष्काम भाव से (सकाम होने पर आप स्वामी नहीं बन सकते); न—नहीं; अन्यथा—सेवक-सेव्य जैसे सम्बन्ध के बिना; इह—यहाँ; आवयो:—हमारा; अर्थ:—किसी स्वार्थ के (भगवान् शुद्ध स्वामी हैं और प्रह्लाद महाराज नि:स्वार्थ शुद्ध भक्त हैं); राज—राजा; सेवकयो:—तथा सेवक के; इव—सदृश (जिस तरह राजा सेवक के लाभ हेतु कर लेता है या जनता राजा हेतु कर देती है) ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, मैं आपका नि:स्वार्थ सेवक हूँ और आप मेरे नित्य स्वामी हैं। सेवक तथा स्वामी होने के अतिरिक्त हमें कुछ भी नहीं चाहिए। आप प्राकृतिक रूप से मेरे स्वामी हैं और मैं आपका सेवक हूँ। हम दोनों में कोई अन्य सम्बन्ध नहीं है।
 
तात्पर्य
 श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा था—जीवेर ‘स्वरूप’ हय—कृष्णेर ‘नित्य दास’—प्रत्येक जीव भगवान् कृष्ण का शाश्वत दास है। भगवान् कृष्ण भगवद्गीता (५.२९) में कहते हैं—भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्—मैं सभी लोकों का स्वामी और परम भोक्ता हूँ। भगवान् की यह स्वाभाविक स्थिति है और जीव की स्वाभाविक स्थिति है कि वह उनकी शरण में जाये (सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज )। यदि यह सम्बन्ध बना रहता है, तो स्वामी तथा सेवक के मध्य शाश्वत तथा वास्तविक सुख बना रहता है। दुर्भाग्यवश जब यह शाश्वत सम्बन्ध गड़बड़ा जाता है, तो जीव अलग रहते हुए सुखी बनना चाहता है और अपने स्वामी को अपना आदेशपालक समझ लेता है। इस तरह से सुख नहीं मिल सकता। स्वामी को भी चाहिए कि वह अपने सेवक की इच्छाएँ पूरी न करता रहे। यदि वह ऐसा करता है, तो वह असली स्वामी नहीं है। असली स्वामी तो वह आदेश देता है “तुम्हें यह करना है” और असली सेवक तुरन्त आदेश का पालन करता है। जब तक परमेश्वर एवं अधीनस्थ जीव के मध्य ऐसा सम्बन्ध स्थापित नहीं हो जाता, तब तक असली सुख नहीं मिल सकता। जीव तो आश्रय है—सदैव अधीन—और भगवान् विषय हैं अर्थात् परम जीवन लक्ष्य हैं। दुर्भाग्यवश इस जगत में फँसे हुए लोग इसे नहीं जानते। न ते विदु: स्वार्थगतिं हि विष्णुम्—भौतिक शक्ति द्वारा मोहित होने से इस जगत का प्रत्येक जीव अचेत रहता है कि जीवन का एकमात्र लक्ष्य भगवान् विष्णु के पास जाना है।
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्।

तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥

पद्मपुराण में शिवजी अपनी पत्नी पार्वती अर्थात् देवी दुर्गा को बताते हैं कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना है और वे तभी प्रसन्न हो सकते हैं जब उनका दास प्रसन्न होता है। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु शिक्षा देते हैं—गोपीभर्तु:पदकमलयोर्दासदासानुदास:। मनुष्य को दास का भी दास होना चाहिए। प्रह्लाद महाराज ने भी भगवान् नृसिंहदेव से प्रार्थना की कि वे उन्हें अपने सेवक बना लें। भक्ति की यह निर्धारित विधि है। ज्योंही भक्त भगवान् को अपना आदेशवाहक बनाना चाहता है त्योंही भगवान् ऐसे स्वार्थी भक्त का स्वामी बनने से इनकार कर देते हैं। भगवद्गीता (४.११) में भगवान् कहते हैं—ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्—जो जिस तरह मेरी शरण ग्रहण करता है उसी के अनुसार मैं उसे पुरस्कार प्रदान करता हूँ। भौतिकतावादी व्यक्ति सामान्यतया भौतिक लाभ की ओर प्रवृत्त होते हैं। जब तक व्यक्ति ऐसी दूषित अवस्था में रहता है तब तक उसे भगवद्धाम वापस जाने का लाभ नहीं मिल पाता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥