श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 8

 
श्लोक
इन्द्रियाणि मन: प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मति: ।
ह्री: श्रीस्तेज: स्मृति: सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; मन:—मन; प्राण:—प्राण; आत्मा—शरीर; धर्म:—धर्म; धृति:—धैर्य; मति:—बुद्धि; ह्री:—लज्जा; श्री:—ऐश्वर्य; तेज:—बल; स्मृति:—स्मरण शक्ति; सत्यम्—सत्य; यस्य—जिसकी कामेच्छाएँ; नश्यन्ति—विनष्ट हो जाती हैं; जन्मना—जन्म से ही ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, जन्म काल से ही कामेच्छाओं के कारण मनुष्य की इन्द्रियों के कार्य, मन, जीवन, शरीर, धर्म, धैर्य, बुद्धि, लज्जा, ऐश्वर्य, बल, स्मृति तथा सत्यनिष्ठा समाप्त हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत में कहा गया है कामं हृद्रोगम्। भौतिकतावादी जीवन का अर्थ ही होता है कि मनुष्य कामेच्छा नामक भयंकर रोग से पीडि़त है। मुक्ति का अर्थ है कामेच्छा से मुक्त होना, क्योंकि ऐसी इच्छा के कारण ही मनुष्य को बारम्बार जन्म तथा मृत्यु स्वीकार करनी पड़ती है। जब तक उसकी कामेच्छाएँ पूरी नहीं हो पातीं, तब तक वह उन्हें पूरी करने के लिए बारम्बार जन्म लेता है। अतएव भौतिक इच्छाओं के कारण ही मनुष्य विभिन्न कार्य करता है और विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करके कभी न तुष्ट होने वाली इच्छाओं को पूरी करने का प्रयास करता है। इसकी एकमात्र औषधि है भक्ति में लग जाना जो समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने पर प्रारम्भ होती है। अन्याभिलाषिताशून्यम्। अन्य- अभिलाषिता का अर्थ “भौतिक इच्छा” और शून्यम् का अर्थ है “से मुक्त।” आध्यात्मिक जीव के कार्यकलाप आध्यात्मिक होते हैं और इच्छाएँ भी आध्यात्मिक होती हैं, जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वर्णन किया है—मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि। भगवान् की अनन्य भक्ति ही एकमात्र आध्यात्मिक इच्छा है। किन्तु इस इच्छा को पूरा करने के लिए मनुष्य को समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना चाहिए। इच्छारहित का अर्थ है भौतिक इच्छाओं से मुक्ति। श्रील रूप गोस्वामी ने इसे अन्याभिलाषिताशून्यम् कहा है। जैसे ही मनुष्य में भौतिक इच्छाएं उत्पन्न होती है, उसकी आध्यात्मिक पहचान समाप्त हो जात है। तब जीवन का सारा साज-सामान जिसमें मनुष्य की इन्द्रियाँ, शरीर, धर्म, धैर्य तथा बुद्धि सम्मिलित हैं, मूल कृष्णचेतना से विपथ हो जाता है। भौतिक इच्छाओं के उदय होते ही मनुष्य अपनी इन्द्रियों का तथा बुद्धि का उपयोग भगवान् की तुष्टि के लिए सही ढंग से नहीं कर पाता। मायावादी विचारक निर्विशेष, संज्ञाहीन तथा मनरहित बनना चाहते हैं, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। जीव को जीवित रहना ही पड़ता है, सदैव इच्छाओं-आकांक्षाओं आदि से युक्त होकर। किन्तु इन्हें शुद्ध बनाना चाहिए जिससे मनुष्य भौतिक कल्मश के बिना आध्यात्मिक रूप से आकांक्षा कर सके। प्रत्येक जीव में ये प्रवृत्तियाँ रहती हैं, क्योंकि वह सजीव है। किन्तु भौतिकता से कलुषित होने पर वह भौतिक विपत्ति के हाथों में चला जाता है (जन्ममृत्युजराव्याधि )। यदि मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से बचना चाहता है, तो उसे भगवान् की भक्ति ग्रहण करनी चाहिए—
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्।

हृषीकेण हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते ॥

“भक्ति का अर्थ है अपनी समस्त इन्द्रियों को इन्द्रियों के स्वामी भगवान् की सेवा में लगाना। जब आत्मा परमेश्वर की सेवा करता है, तो उसके दो अतिरिक्त प्रभाव होते हैं—एक तो वह समस्त भौतिक उपाधियों से मुक्त हो जाता है और दूसरा यह कि भगवान् की सेवा में लगने मात्र से ही मनुष्य की इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥