श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 9

 
श्लोक
विमुञ्चति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान् ।
तर्ह्येव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
विमुञ्चति—छोड़ देता है; यदा—जब भी; कामान्—समस्त भौतिक इच्छाओं को; मानव:—मानव समाज; मनसि—मन के भीतर; स्थितान्—स्थित; तर्हि—तभी; एव—निस्सन्देह; पुण्डरीक-अक्ष—हे कमलनयन भगवान्; भगवत्त्वाय—भगवान् के समान ही ऐश्वर्यवान होने का; कल्पते—पात्र बनता है ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, जब मनुष्य अपने मन से सारी भौतिक इच्छाएँ निकालने में सक्षम हो जाता है, तो वह आपके ही समान सम्पत्ति तथा ऐश्वर्य का पात्र बन जाता है।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी नास्तिक लोग भक्त की आलोचना यह कह कर करते हैं “यदि तुम भगवान् से वरदान लेना नहीं चाहते और यदि भगवान् का सेवक भगवान् के ही समान ऐश्वर्यवान् है, तो फिर तुम भगवान् के सेवक बने रहने का वरदान क्यों माँगते हो?” श्रीधर स्वामी की टीका है—भगवत्त्वाय भगवत् समान ऐश्वर्याय। भगवत्त्व अर्थात् भगवान् के ही समान होने का अर्थ भगवान् से तादात्म्य या उनके समान होना नहीं
है, यद्यपि आध्यात्मिक जगत में सेवक स्वामी के समान ही ऐश्वर्यवान् होता है। भगवान् का सेवक दास, मित्र, पिता, माता या प्रेमी के रूप में भगवान् की सेवा में लगा रहता है और ये सभी भगवान् के ही समान ऐश्वर्यवान् होते हैं। यही अचिन्त्यभेदाभेदतत्त्व है। सेवक तथा स्वामी भिन्न होते हुए भी ऐश्वर्य में समान हैं। भगवान् से एकसाथ भिन्नता तथा एकत्त्व का यही अर्थ है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥