श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 11: पूर्ण समाज: चातुर्वर्ण  »  श्लोक 17

 
श्लोक
जघन्यो नोत्तमां वृत्तिमनापदि भजेन्नर: ।
ऋते राजन्यमापत्सु सर्वेषामपि सर्वश: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
जघन्य:—निम्न (पुरुष); न—नहीं; उत्तमाम्—उच्च; वृत्तिम्—जीविका का साधन; अनापदि—जहाँ सामाजिक उपद्रव नहीं होते; भजेत्—स्वीकार करे; नर:—मनुष्य; ऋते—के अतिरिक्त; राजन्यम्—क्षत्रिय का व्यवसाय; आपत्सु—आपात्काल में; सर्वेषाम्—जीवन के प्रत्येक स्तर के प्रत्येक व्यक्ति का; अपि—निश्चय ही; सर्वश:—सारे व्यवसाय या वृत्तिपरक कर्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 आपात्काल के अतिरिक्त निम्न लोगों को उच्च वर्ग के वृत्तिपरक कार्य नहीं करने चाहिए। हाँ, यदि आपात्काल हो तो क्षत्रिय के अतिरिक्त अन्य सभी लोग अन्यों की जीविकाएँ स्वीकार कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 निम्न जाति के लोगों को, विशेष रूप से वैश्यों तथा शूद्रों को, ब्राह्मण के वृत्तिपरक कर्तव्य स्वीकार नहीं करने चाहिए। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण का वृत्तिपरक कर्तव्य वेदों का अध्यापन है, किन्तु जब तक आपात्काल न हो, क्षत्रियों, वैश्यों या शूद्रों को यह वृत्ति नहीं अपनानी चाहिए। यहाँ तक कि क्षत्रिय भी ब्राह्मण के कार्यों को तब तक स्वीकार नहीं कर सकता जब तक आपात्काल न हो। और यदि वह ऐसा करे तो उसे अन्य किसी से दान नहीं लेना चाहिए। कभी-कभी ब्राह्मण लोग हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन का विरोध करते हैं कि हम यूरोपवासियों को अर्थात् मलेच्छों तथा यवनों को ब्राह्मण बना रहे हैं,
लेकिन यहाँ पर श्रीमद्भागवत में इस आन्दोलन को समर्थन मिलता है। इस समय समाज में अव्यवस्था फैली हुई है और हर व्यक्ति ने उस आध्यात्मिक जीवन का अनुशीलन छोड़ दिया है, जो विशेषत: ब्राह्मणों के लिए है। चूँकि सारे विश्व में आध्यात्मिक संस्कृति बन्द कर दी गई है, अतएव इस समय आपात्काल है, अत: अब वह समय आ गया है कि जब नीच तथा अधम को शिक्षित किया जाये जिससे वे ब्राह्मण बनकर आध्यात्मिक प्रगति का कार्य अपना सकें। मानव समाज की आध्यात्मिक प्रगति बन्द हो चुकी है और इसे आपात्काल समझना चाहिए। यहाँ पर कृष्णभावनामृत नामक आन्दोलन के लिए नारद मुनि का ठोस समर्थन प्राप्त होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥