श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 11: पूर्ण समाज: चातुर्वर्ण  »  श्लोक 23

 
श्लोक
देवगुर्वच्युते भक्तिस्त्रिवर्गपरिपोषणम् ।
आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्यलक्षणम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
देव-गुरु-अच्युते—देवताओं, गुरु तथा भगवान् विष्णु में; भक्ति:—भक्तिभाव; त्रि-वर्ग—पवित्र जीवन के तीन सिद्धान्तों (धर्म, अर्थ तथा काम) का; परिपोषणम्—सम्पन्न होना; आस्तिक्यम्—शास्त्रों, गुरु तथा परमेश्वर में श्रद्धा; उद्यम:—सक्रिय; नित्यम्—निरन्तर, अनवरत; नैपुण्यम्—निपुणता; वैश्य-लक्षणम्—वैश्य के लक्षण ।.
 
अनुवाद
 
 देवता, गुरु तथा भगवान् विष्णु के प्रति सदैव अनुरक्ति, धर्म, अर्थ तथा काम में प्रयत्नशीलता; गुरु तथा शास्त्र के शब्द में विश्वास; तथा धनार्जन में निपुणता सहित प्रयत्नशील होना—ये वैश्य के लक्षण हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥