श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 11: पूर्ण समाज: चातुर्वर्ण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
स्त्रीणां च पतिदेवानां तच्छुश्रूषानुकूलता ।
तद्बन्धुष्वनुवृत्तिश्च नित्यं तद्‌व्रतधारणम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
स्त्रीणाम्—स्त्रियों का; च—भी; पति-देवानाम्—जिन्होंने अपने पतियों को पूज्य मान रखा है; तत्-शुश्रूषा—अपने पति की सेवा करने में तत्परता; अनुकूलता—अपने पति के प्रति अनुकूल रहना; तत्-बन्धुषु—पति के मित्रों तथा सम्बन्धियों में; अनुवृत्ति:—उसी प्रकार अनुकूलता (पति के सन्तोष के लिए उनसे भी सद्व्यवहार करना); च—तथा; नित्यम्—नियमित रूप से; तत्-व्रत-धारणम्—पति के व्रतों को स्वीकार करते हुए अथवा पति के अनुसार कर्म करना ।.
 
अनुवाद
 
 पति की सेवा करना, अपने पति के अनुकूल रहना, पति के सम्बन्धियों तथा मित्रों के प्रति भी समान रूप से अनुकूल रहना तथा पति के व्रतों का पालन करना—ये चार नियम पतिव्रता स्त्री के लिए पालनीय हैं।
 
तात्पर्य
 एक शान्त गृहस्थ जीवन के लिए यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि स्त्री अपने पति के व्रत का पालन करे। पति के व्रत से किसी प्रकार का असामंजस्य पारिवारिक जीवन का उच्छेद कर देगा। इस प्रसंग में चाणक्य पण्डित का उपदेश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—दम्पतयो: कलहो नास्ति तत्र श्री: स्वयमागता:। जहां पति-पत्नी में झगड़ा नहीं होता वहां भाग्य की देवी (लक्ष्मी) स्वयं उस घर में आती हैं। स्त्री की शिक्षा इस श्लोक में दिए संकेतों के अनुसार होनी चाहिए। पतिव्रता स्त्री के लिए मूल सिद्धान्त यही है कि वह सदा पति के अनुकूल रहे। भगवद्गीता (१.४०) में कहा गया है—स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकर:—यदि स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, तो वर्णसंकर संतानें होती हैं। आधुनिक शब्दावली में वर्णसंकर तो हिप्पी हैं, जो विधि-विधानों को नहीं मानते। दूसरी व्याख्या यह है कि जब जनता वर्णसंकर होती है, तो कोई यह नहीं जान पाता कि कौन किस स्तर पर है। वर्णाश्रम प्रणाली समाज को वैज्ञानिक ढंग से चार वर्णों तथा चार आश्रमों में विभाजित करती है, किन्तु वर्णसंकर समाज में ऐसा विभेद नहीं दिखता और कोई यह नहीं जान सकता कि कौन क्या है। ऐसे समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में अन्तर कर पाना कठिन होता है। शान्ति तथा प्रसन्नता के लिए वर्णाश्रम प्रणाली का आरम्भ भौतिक जगत में किया जाना चाहिए। जगत में मनुष्य के कार्यकलापों के लक्षण सुस्पष्ट होने चाहिए और उसी के अनुसार उसको शिक्षा दी जानी चाहिए। तब आध्यात्मिक प्रगति स्वत: सम्भव हो जाएगी।
 
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