श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 11: पूर्ण समाज: चातुर्वर्ण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
नारायणपरा विप्रा धर्मं गुह्यं परं विदु: ।
करुणा: साधव: शान्तास्त्वद्विधा न तथापरे ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
नारायण-परा:—भगवान् के प्रति सदैव आज्ञाकारी रहने वाले; विप्रा:—ब्राह्मणों में श्रेष्ठ; धर्मम्—धार्मिक सिद्धान्त; गुह्यम्— अत्यन्त गोपनीय; परम्—परम; विदु:—जानते हैं; करुणा:—ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दयालु होते हैं (भक्त होने से); साधव:— जिनका आचरण अत्यन्त श्रेष्ठ है; शान्ता:—शान्त; त्वत्-विधा:—आपके ही समान; न—नहीं; तथा—इस तरह; अपरे—अन्य (भक्ति के अतिरिक्त अन्य विधियों के अनुयायी) ।.
 
अनुवाद
 
 शान्त जीवन तथा दया में आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं है और आपसे बढक़र कोई यह नहीं जानता कि भक्ति किस तरह की जाये या ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ किस प्रकार बना जाये। अतएव आप गुह्य धार्मिक जीवन के समस्त सिद्धान्तों के जानने वाले हैं और आपसे बढक़र उन्हें अन्य कोई नहीं जानता।
 
तात्पर्य
 महाराज युधिष्ठिर जानते थे कि नारद मुनि मानव समाज के परम गुरु हैं, जो आध्यात्मिक मुक्ति के मार्ग की शिक्षा दे सकते हैं जिससे भगवान् को समझा जा सकता है। वस्तुत: इसी प्रयोजन से नारद मुनि ने भक्तिसूत्र का संग्रह किया और नारद पञ्चरात्र में निर्देश दिये। धार्मिक नियमों तथा जीवन की सिद्धि के विषय में सीखने के लिए मनुष्य को नारद मुनि की शिष्य-परम्परा से उपदेश ग्रहण करने चाहिए। हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन सीधे ब्रह्म-सम्प्रदाय की पंक्ति में है। नारद मुनि ने ब्रह्मा से जो उपदेश प्राप्त किया था उसे ही उन्होंने व्यासदेव को दिया। व्यासदेव ने अपने पुत्र शुकदेव गोस्वामी को उपदेश दिया जिन्होंने श्रीमद्भागवत का प्रवचन किया। कृष्णभावनामृत आन्दोलन श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता पर आधारित है। चूँकि श्रीमद्भागवत शुकदेव गोस्वामी द्वारा कहा गया था तथा भगवद्गीता कृष्ण द्वारा कही गई थी, अतएव उनमें कोई अन्तर नहीं है। यदि हम शिष्य-परम्परा के सिद्धान्त का दृढ़ता से पालन करें तो निश्चय ही हम आध्यात्मिक मोक्ष या भक्ति में नित्य लगे रहने के सही मार्ग पर चल रहे होते हैं।
 
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