श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 24

 
श्लोक
तृष्णया भववाहिन्या योग्यै: कामैरपूर्यया ।
कर्माणि कार्यमाणोऽहं नानायोनिषु योजित: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
तृष्णया—इच्छाओं के कारण; भव-वाहिन्या—प्रकृति के भौतिक नियमों की चपेट में; योग्यै:—क्योंकि यह; कामै:—भौतिक इच्छाओं से; अपूर्यया—अन्तहीन, एक के बाद एक; कर्माणि—कार्यकलाप; कार्यमाण:—कार्य करने के लिए बाध्य; अहम्—मैं; नाना-योनिषु—जीवन के विभिन्न रूपों में; योजित:—जीवन-संघर्ष में लगा हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 अतृप्त भौतिक इच्छाओं के कारण मैं प्राकृतिक नियमों की तरंगों द्वारा बहा या लिए जा रहा था और जीवन की विभिन्न योनियों में जीवन-संघर्ष करते हुए विभिन्न कार्यकलापों में लगा रहा।
 
तात्पर्य
 जब तक मनुष्य अपनी विविध भौतिक इच्छाओं को पूरा करना चाहता है तब तक वह निरन्तर एक शरीर छोडक़र दूसरे शरीर को ग्रहण करता रहता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि जिस प्रकार एक घास का तिनका नदी में गिर जाता है, तो वह तरह-तरह के काष्ठ तथा पेड़ की टहनियों के साथ बहता रहता है उसी प्रकार जीव भव-सागर में तैरता रहता है और भौतिक दशाओं के बीच टक्कर खाता तथा उछलता है। यही जीवन-संघर्ष है। एक प्रकार के सकाम कर्म से जीव को एक प्रकार का शरीर प्राप्त होता है और उस शरीर से किये गये कर्मों से दूसरा शरीर उत्पन्न होता है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि इन भौतिक कार्यकलापों को बन्द कर दे और ऐसा करने का अवसर मनुष्य जीवन में ही प्राप्त हो पाता है। विशेष रूप से हमें अपनी कार्य शक्ति को भगवान् की सेवा में लगाना चाहिए, क्योंकि तब भौतिक कार्यकलाप स्वत: रुक जाएँगे। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् की शरण ग्रहण करके अपनी इच्छाएँ पूरी करे, क्योंकि वे इन्हें पूरा करना जानते हैं। अतएव भौतिक इच्छाओं के रहते हुए भी मनुष्य को भक्त की सेवा में लग जाना चाहिए। इससे उसका जीवन-संघर्ष शुद्ध हो जाएगा।
अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥

“जिस व्यक्ति में व्यापक बुद्धि है, वह चाहे भौतिक इच्छाओं से पूर्ण हो, या किसी भी इच्छा से रहित हो या मुक्ति की कामना करता हो, उसे हर तरह से परम पुरुष भगवान् की पूजा करनी चाहिए।” (भागवत २.३.१०) अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्।

आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥

“मनुष्य को चाहिए कि अनुकूल होकर तथा सकाम कर्म या दार्शनिक चिन्तन द्वारा किसी प्रकार के भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होकर भगवान् कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति करे।” (भक्तिरसामृत सिन्धु १.१.११)

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥