श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 30

 
श्लोक
देहादिभिर्दैवतन्त्रैरात्मन: सुखमीहत: ।
दु:खात्ययं चानीशस्य क्रिया मोघा: कृता: कृता: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
देह-आदिभि:—शरीर, मन, अहंकार तथा बुद्धि से; दैव-तन्त्रै:—परम शक्ति के अधीन; आत्मन:—आत्मा का; सुखम्—सुख; ईहत:—खोज करते हुए; दु:ख-अत्ययम्—दुखों की कमी; च—भी; अनीशस्य—प्रकृति के अधीन जीव; क्रिया:— कार्यकलाप तथा योजनाएँ; मोघा: कृता: कृता:—पुन:-पुन: व्यर्थ हो जाती हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जीव सुख प्राप्त करना चाहता है और दुख के कारणों से छूटना चाहता है, लेकिन चूँकी जीवों के शरीर प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में होते हैं, अतएव जीव एक के बाद एक विभिन्न शरीरों को पाकर जितनी भी योजनाएँ बनाता है वे अन्ततोगत्वा व्यर्थ हो जाती हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि भौतिकतावादी व्यक्ति इस घोर अंधकार में रहता है कि प्रकृति के नियम किस प्रकार उसके कर्मों के अनुसार उस पर प्रभाव डालते हैं अतएव वह भूल करके आर्थिक विकास के उच्चलोकों में जाने के उद्देश्य से पुण्यकर्मों द्वारा तथा अन्य विधियों से मनुष्य-जीवन में शारीरिक सुपास भोगने की योजनाएँ बनाता है। किन्तु वास्तव में वह अपने कर्मफलों का शिकार बनता है। भगवान् सभी जीवों के अन्तस्तल में परमात्मा रूप में स्थित हैं। जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में भगवान् कहते हैं—
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

“मैं सबों के हृदय में स्थित हूँ और मुझी से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न होती है।” जीव की इच्छाएँ तथा कार्यकलाप परमात्मा द्वारा देखे जाते हैं, क्योंकि वे उपद्रष्टा हैं और वे जीव की विविध इच्छाओं की पूर्ती के लिए प्रकृति को आदेश देते हैं। जैसाकि भगवद्गीता (१८.६१) में स्पष्ट कहा गया है—

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

भगवान् सबों के हृदय में आसीन रहते हैं और जो जैसा चाहता है उसी के अनुसार भगवान् उसे विविध प्रकार के शरीर प्रदान करते हैं, जो यंत्रों के समान हैं। जीव ऐसे यंत्र पर आरूढ़ होकर प्रकृति तथा उसके गुणों के वशीभूत रहकर ब्रह्माण्ड भर में घूमता है। इस तरह जीव कर्म करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है, अपितु प्रकृति के पूर्णतया अधीन रहता है और यह प्रकृति भगवान् के पूर्ण नियंत्रण में रहती है।

ज्योंही जीव भौतिक इच्छाओं द्वारा प्रकृति पर प्रभुत्व जताने के लिए प्रताडि़त किया जाता है त्योंही उस पर प्रकृति का नियंत्रण हो जाता है, जिसका अधीक्षण परमात्मा द्वारा होता है। इसका परिणाम यह होता है कि मनुष्य बारम्बार योजनाएँ बनाता है और निराश होता रहता है, किन्तु मूर्ख व्यक्ति होने के कारण वह इस निराशा का कारण नहीं देख पाता। इस कारण का स्पष्ट उल्लेख भगवद्गीता में हुआ है—दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया—चूँकि मनुष्य परमेश्वर की शरण ग्रहण नहीं करता, अतएव उसे प्रकृति तथा उसके कठोर नियमों के अन्तर्गत कार्य करना होता है। इस बन्धन से छूटने का एकमात्र उपाय भगवान् की शरण ग्रहण करना है। मनुष्य जीवन में जीव को यह उपदेश परम पुरुष कृष्ण से ग्रहण करना चाहिए—सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—“तुम सुख प्राप्त करने और दुख भगाने की योजना मत बनाओ। तुम इसमें कभी सफल नहीं होगे। तुम केवल मेरी शरण में आओ।” किन्तु दुर्भाग्यवश वह भगवद्गीता में स्पष्ट रूप में दिये गये भगवान् के इस आदेश को स्वीकार नहीं करता। इस तरह मनुष्य प्रकृति के नियमों का नित्य बन्दी बन जाता है।

यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:—यदि मनुष्य विष्णु या यज्ञ नाम से विख्यात कृष्ण की तुष्टि के लिए कर्म नहीं करता तो वह कर्मफलों के बन्धन में फँस जाएगा। ये बन्धन पाप तथा पुण्य कहलाते हैं। पुण्यकर्मों से मनुष्य उच्चलोकों को जाता है और पापकर्मों से अधम जीवयोनियों को प्राप्त होता है जिनमें वह प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डित किया जाता है। जीवन की अधम योनियों में विकास प्रक्रम पाया जाता है और जब इन योनियों में जीव के बन्धन या दण्ड की अवधि समाप्त हो जाती है, तो उसे पुन: मनुष्य जीवन प्रदान किया जाता है और इसका अवसर दिया जाता है कि वह किस तरह योजना बनाए। यदि वह अवसर को पुन: खो देता है, तो उसे जन्म-मृत्यु के चक्कर में पुन: डाल दिया जाता है और संसार-चक्र में कभी वह नीचे जाता है, तो कभी ऊपर आता है। जिस प्रकार चक्र (पहिया) कभी नीचे तो कभी ऊपर जाता है उसी प्रकार प्रकृति के कठोर नियम जीव को कभी सुखी बनाते हैं, तो कभी दुखी। सुख-दुख के चक्र में वह जिस प्रकार कष्ट उटाता है उसका वर्णन अगले श्लोक में हुआ है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥