श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 38

 
श्लोक
क्‍वचिदल्पं क्‍वचिद्भ‍ूरि भुञ्जेऽन्नं स्वाद्वस्वादु वा ।
क्‍वचिद्भ‍ूरि गुणोपेतं गुणहीनमुत क्व‍चित् ।
श्रद्धयोपहृतं क्व‍ापि कदाचिन्मानवर्जितम् ।
भुञ्जे भुक्त्वाथ कस्मिंश्चिद्दिवा नक्तं यद‍ृच्छया ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कभी; अल्पम्—अत्यन्त थोड़ा; क्वचित्—कभी; भूरि—काफी मात्रा; भुञ्जे—खाता हूँ; अन्नम्—भोजन; स्वादु— स्वादिष्ट; अस्वादु—बासी; वा—अथवा; क्वचित्—कभी; भूरि—अधिक; गुण-उपेतम्—सुगंधित; गुण-हीनम्—गंधरहित; उत—चाहे; क्वचित्—कभी; श्रद्धया—श्रद्धापूर्वक; उपहृतम्—किसी के द्वारा लाया गया; क्वापि—कभी; कदाचित्—कभी; मान-वर्जितम्—बिना सम्मान के प्रदत्त; भुञ्जे—खाता हूँ; भुक्त्वा—खाकर; अथ—इस तरह; कस्मिन् चित्—कभी किसी स्थान पर; दिवा—दिन; नक्तम्—अथवा रात्रि में; यदृच्छया—जैसा भी मिल जाय ।.
 
अनुवाद
 
 कभी मैं थोड़ा खाता हूँ और कभी अधिक। कभी भोजन स्वादिष्ट होता है, तो कभी बासी। कभी बड़े आदर के साथ मुझे प्रसाद दिया जाता है और कभी अत्यन्त उपेक्षा से भोजन मिलता है। कभी मैं दिन में खाता हूँ तो कभी रात में। इस प्रकार मुझे जो कुछ आसानी से मिल जाता है उसे ही खाता हूँ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥