श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 39

 
श्लोक
क्षौमं दुकूलमजिनं चीरं वल्कलमेव वा ।
वसेऽन्यदपि सम्प्राप्तं दिष्टभुक्तुष्टधीरहम् ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
क्षौमम्—लिनन का कपड़ा; दुकूलम्—रेशमी या सूती; अजिनम्—मृगचर्म; चीरम्—चिरकुट, लंगोट; वल्कलम्—छाल; एव—जैसा हो; वा—अथवा; वसे—धारण करता हूँ; अन्यत्—अन्य कुछ; अपि—यद्यपि; सम्प्राप्तम्—उपलब्ध; दिष्ट-भुक्— भाग्यवश; तुष्ट—संतुष्ट; धी:—मन; अहम्—मैं हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 शरीर ढकने के लिए मेरे भाग्य से मुझे जो कुछ भी मिल जाता है, चाहे क्षौम वस्त्र हो या रेशमी या सूती कपड़ा, चाहे पेड़ की छाल हो या मृगछाला, उसे मैं काम में लाता हूँ। मैं पूर्ण संतुष्ट रहता हूँ तथा विचलित नहीं होता।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥