श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 5

 
श्लोक
सुप्तिप्रबोधयो: सन्धावात्मनो गतिमात्मद‍ृक् ।
पश्यन्बन्धं च मोक्षं च मायामात्रं न वस्तुत: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
सुप्ति—अचेतनावस्था में; प्रबोधयो:—चेतना अवस्था में; सन्धौ—सन्धि अवस्था में; आत्मन:—अपनी आत्मा में; गतिम्—गति; आत्म-दृक्—जो आत्मा को देख सकता है; पश्यन्—देखने या समझने का प्रयास करते हुए; बन्धम्—जीवन की बद्ध अवस्था; च—तथा; मोक्षम्—जीवन की मुक्त अवस्था; च—भी; माया-मात्रम्—मात्र मोह; न—नहीं; वस्तुत:—वास्तव में ।.
 
अनुवाद
 
 उसे अचेतना तथा चेतना अवस्थाओं में इन दोनों के बीच की अवस्था में अपने आपको समझने का प्रयत्न करना चाहिए और आत्म-स्थित होना चाहिए। इस प्रकार उसे यह अनुभव करना चाहिए कि जीवन की बद्ध तथा मुक्त अवस्थाएँ मात्र भ्रम हैं, वे वास्तविक नहीं हैं। ऐसे उच्च ज्ञान से उसे सर्वव्यापी परम सत्य का दर्शन करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 अचेतना अवस्था अज्ञान, अंधकार या भौतिक जगत के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। चेतना अवस्था में मनुष्य जाग्रत रहता है। अचेतना तथा चेतना दोनों की मध्यावस्था में कोई स्थायी अस्तित्व नहीं रहता। अतएव जो व्यक्ति अपने को समझने में बढ़ा चढ़ा है उसे यह समझ लेना चाहिए कि अचेतन तथा चेतन मात्र भ्रम हैं, क्योंकि मूलत: इनका अस्तित्व नहीं होता। केवल परम सत्य का ही अस्तित्व है। जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता (९.४) में पुष्टि की है—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

“यह समग्र ब्रह्माण्ड मेरे अव्यक्त रूप में मुझसे व्याप्त है। सारे जीव मुझमें हैं किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।” प्रत्येक वस्तु कृष्ण के निराकार रूप के आधार पर विद्यमान रहती है; कृष्ण के बिना कुछ भी नहीं रह सकता। अतएव कृष्ण का श्रेष्ठ भक्त भगवान् को बिना भ्रम के सर्वत्र देख सकता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥