श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 8

 
श्लोक
न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद् बहून् ।
न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत्‍क्‍वचित् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; शिष्यान्—शिष्यों को; अनुबध्नीत—भौतिक लाभ के लिए प्रेरित करे; ग्रन्थान्—व्यर्थ का साहित्य; न—नहीं; एव— निश्चय ही; अभ्यसेत्—समझने या अनुशीलन करने का प्रयास करे; बहून्—अनेक; न—नहीं; व्याख्याम्—व्याख्यान को; उपयुञ्जीत—जीविका का साधन बनाए; न—न तो; आरम्भान्—अनावश्यक ऐश्वर्य; आरभेत्—बढ़ाने का यत्न करे; क्वचित्— कभी भी ।.
 
अनुवाद
 
 संन्यासी को चाहिए कि वह न तो अनेक शिष्य एकत्र करने के लिए भौतिक लाभों का प्रलोभन दे, न व्यर्थ ही अनेक पुस्तकें पढ़े, न जीविका के साधन के रूप में व्याख्यान दे। न व्यर्थ ही भौतिक ऐश्वर्य बढ़ाने का कभी कोई प्रयास करे।
 
तात्पर्य
 सामान्यत: तथाकथित स्वामी तथा योगी लोगों को भौतिक लाभों का प्रलोभन देकर शिष्य बनाते हैं। ऐसे अनेक तथाकथित गुरु हैं, जो रोगों को अच्छा करने या सोना बनाकर भौतिक ऐश्वर्य को बढ़ाने का वादा करके शिष्यों को आकर्षित करते हैं। ये रुपये-पैसे वाले प्रलोभन अज्ञानी व्यक्तियों के लिए होते हैं। संन्यासी को ऐसे भौतिक प्रलोभनों द्वारा शिष्य बनाना वर्जित है। कभी-कभी संन्यासी अनेक मन्दिर तथा मठ बनवाकर भौतिक ऐश्वर्य में फँस जाते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसे प्रयासों से बचना चाहिए। मन्दिरों तथा मठों का निर्माण आध्यात्मिक चेतना या कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए किया जाना चाहिए, न कि ऐसे लोगों के लिए नि:शुल्क होटलों की व्यवस्था करने के लिए जो भौतिक या आध्यात्मिक कार्यों के लिए उपयोगी नहीं होते। मन्दिरों तथा मठों को सनकी व्यक्तियों के निकम्मे क्लबों की सीमाओं से दूर रखना चाहिए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन
में हम उस प्रत्येक व्यक्ति का स्वागत करते हैं, जो आन्दोलन के अनुष्ठानों की सीमाओं से दूर रखना—अवैध मैथुन न करने, नशा न करने, मांस न खाने तथा जुआ न खेलने—पालन के लिए तैयार हो जाता है। मन्दिरों तथा मठों में अनावश्यक, त्यक्त, आलसी व्यक्तियों की भीड़ करने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जानी चाहिए। इनका उपयोग केवल उन भक्तों के लिए होना चाहिए जो कृष्णभावनामृत में आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए गम्भीर हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने आरम्भान् शब्द का अर्थ मठादि व्यापारान् लगाया है, जिसका अर्थ है “मन्दिर तथा मठ बनाने के प्रयास”। संन्यासी का प्रधान कार्य तो कृष्णभावनामृत का प्रचार करना है, किन्तु यदि भगवत्कृपा से सुविधाएँ उपलब्ध हों तो वह कृष्णभावनामृत के प्रचार छात्रों को आश्रय देने के लिए मन्दिरों तथा मठों का निर्माण करा सकता है। अन्यथा ऐसे मन्दिरों तथा मठों की कोई आवश्यकता नहीं है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥