श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 14

 
श्लोक
सिद्धैर्यज्ञावशिष्टार्थै: कल्पयेद् वृत्तिमात्मन: ।
शेषे स्वत्वं त्यजन्प्राज्ञ: पदवीं महतामियात् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
सिद्धै:—भगवान् की दया से प्राप्त वस्तुएँ; यज्ञा-अवशिष्ट-अर्थै:—पञ्च महायज्ञ सम्पन्न करने के बाद या भगवान् को यज्ञ अर्पित करने के बाद प्राप्त वस्तुएँ; कल्पयेत्—विचार करे; वृत्तिम्—जीविका का साधन; आत्मन:—अपने लिए; शेषे—अन्त में; स्वत्वम्—अपनी पत्नी, बच्चों, घर, व्यापार इत्यादि का तथाकथित स्वामित्व; त्यजन्—त्यागते हुए; प्राज्ञ:—बुद्धिमान लोग; पदवीम्—पद; महताम्—आध्यात्मिक चेतना में पूर्णतया सन्तुष्ट महापुरुषों का; इयात्—प्राप्त करना चाहिए ।.
 
अनुवाद
 
 बुद्धिमान व्यक्ति को प्रसाद खाकर या पाँच विभिन्न प्रकार के यज्ञ सम्पन्न करके तुष्ट रहना चाहिए। ऐसे कार्यों से मनुष्य शरीर तथा शरीर के तथाकथित स्वामित्व के प्रति अपनी अनुरक्ति को त्याग सकता है। जब वह ऐसा करने में समर्थ होता है, तो वह महात्मा के पद पर दृढ़ स्थित हो जाता है।
 
तात्पर्य
 प्रकृति ने पहले से हमें भोजन देने की व्यवस्था कर रखी है। भगवान् के आदेश से चौरासी लाख योनियों में प्रत्येक जीव के लिए खाने की वस्तुओं की व्यवस्था है। एको बहूनां यो विदधाति कामान्। प्रत्येक जीव को कुछ न कुछ खाना पड़ता है और वास्तव में, भगवान् ने पहले से उसके जीवन की आवश्यकता के लिए व्यवस्था कर रखी है। भगवान् ने हाथी और चींटी दोनों ही के लिए भोजन बनाया है। सारे जीव भगवान् के भरोसे जीवित हैं, अतएव बुद्धिमान
मनुष्य को भौतिक सुविधाओं के लिए कठिन श्रम नहीं करना चाहिए। प्रत्युत उसे कृष्णभावनामृत में अग्रेसर होने के लिए अपनी शक्ति बचानी चाहिए। आकाश, वायु, स्थल तथा समुद्र में उत्पन्न की गई सारी वस्तुएँ भगवान् की हैं और हर जीव को भोजन दिया जाता है। अतएव मनुष्य को आर्थिक विकास के विषय में अधिक उत्सुक नहीं रहना चाहिए और न ही जन्म-मृत्यु के चक्र में गिरने के खतरे के लिए व्यर्थ ही समय तथा शक्ति का अपव्यय करना चाहिए।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥