श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 16

 
श्लोक
यर्ह्यात्मनोऽधिकाराद्या: सर्वा: स्युर्यज्ञसम्पद: ।
वैतानिकेन विधिना अग्निहोत्रादिना यजेत् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
यर्हि—जब; आत्मन:—अपना; अधिकार-आद्या:—पूर्ण अधिकार के अन्तर्गत उसके पास की वस्तुएँ; सर्वा:—सारी; स्यु:—हो जाता है; यज्ञ-सम्पद:—यज्ञ सम्पन्न करने की सामग्री या भगवान् को प्रसन्न करने के साधन; वैतानिकेन—यज्ञ करने को बताने वाली प्रामाणिक पुस्तकों से; विधिना—विधानों के अनुसार; अग्नि-होत्र-आदिना—अग्नि में यज्ञ करने से.; यजेत्—भगवान् की पूजा करे ।.
 
अनुवाद
 
 जब कोई व्यक्ति सम्पत्ति तथा ज्ञान से समृद्ध हो, जो उसके पूर्ण नियंत्रण में हों और जिनसे वह यज्ञ सम्पन्न कर सके या भगवान् को प्रसन्न कर सके तो उसे शास्त्रों के निर्देशानुसार अग्नि में आहुतियाँ डालकर यज्ञ करना चाहिए। इस तरह उसे भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 यदि गृहस्थ वैदिक ज्ञान में पटु हो और भगवान् को प्रसन्न करने के लिए पूजा करने हेतु काफी धनवान हो गया हो तो उसे चाहिए कि वह प्रामाणिक शास्त्रों के आदेशानुसार यज्ञ सम्पन्न करे। भगवद्गीता (३.९) में स्पष्ट कहा गया है—यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:—प्रत्येक व्यक्ति को अपना वृत्तिपरक कर्म करना चाहिए, किन्तु इन कर्मों के फल को यज्ञ को अर्पित कर देना चाहिए जिससे भगवान् प्रसन्न हों। यदि कोई इतना भाग्यवान् हो कि दिव्य ज्ञान के साथ-साथ उसके पास धन भी हो जिससे यज्ञ सम्पन्न किया जा सके तो उसे शास्त्रों के आदेशों के अनुसार यज्ञ करने चाहिए। श्रीमद्भागवत (१२.३.५२) में में कहा गया है—
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखै:।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद् हरिकीर्तनात् ॥

सारी वैदिक सभ्यता का लक्ष्य भगवान् को प्रसन्न करना है। सत्ययुग में ऐसा अपने हृदय में भगवान् का तथा त्रेता युग में बहुमूल्य यज्ञ संपन्न करके ध्यान करके किया जाता था। वही लक्ष्य द्वापर युग में मन्दिर में भगवान् की पूजा करके प्राप्त किया जा सकता था और इस कलियुग में सङ्कीर्तन यज्ञ द्वारा उसी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। अतएव जिसके पास विद्या तथा सम्पत्ति दोनों हों उसे चाहिए कि इनका उपयोग भगवान् को प्रसन्न करने के लिए और धनी लोगों का धन भी माया की सेवा में लगा हुआ है। पहले से चल रहे संकीर्तन आन्दोलन हरे कृष्ण आन्दोलन अथवा कृष्णभावनामृत आन्दोलन की सहायता करके करे। सारे शिक्षित तथा सम्पत्तिवान् व्यक्तियों को इस आन्दोलन में सम्मिलित होना चाहिए, क्योंकि सारी विद्या तथा धन भगवान् की सेवा के निमित्त हैं। यदि इन्हें भगवान् की सेवा में नहीं लगाया जाता तो इन बहुमूल्य निधियों को माया की सेवा में लगाना पड़ेगा। इस समय तथाकथित विज्ञानियों, दार्शनिकों तथा कवियों की विद्या माया की सेवा में लगी हुई है और धनी लोगों का धन भी माया की सेवा में लगा हुआ है लेकिन माया की सेवा से विश्व में अराजक स्थिति उत्पन्न होती है। अतएव धनवान व्यक्ति को तथा शिक्षित व्यक्ति को अपने ज्ञान तथा ऐश्वर्य का त्याग भगवान् को सन्तुष्ट करने में कर देना चाहिए और सङ्कीर्तन आन्दोलन में सम्मिलित होना चाहिए (यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस:)।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥