श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 17

 
श्लोक
न ह्यग्निमुखतोऽयं वै भगवान्सर्वयज्ञभुक् ।
इज्येत हविषा राजन्यथा विप्रमुखे हुतै: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; अग्नि—आग; मुखत:—मुख से, ज्वाला से; अयम्—यह; वै—निश्चय ही; भगवान्—भगवान् श्रीकृष्ण; सर्व-यज्ञ-भुक्—सभी प्रकार के यज्ञों के फलों का भोक्ता; इज्येत—पूजा जाता है; हविषा—घी की आहुति से; राजन्—हे राजा; यथा—जिस प्रकार; विप्र-मुखे—ब्राह्मण के मुँह से होकर; हुतै:—उत्तम भोजन की भेंट करके ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्री कृष्ण सारी यज्ञ-आहुतियों के भोक्ता हैं। यद्यपि वे अग्नि में डाली गई आहुतियाँ खाते हैं फिर भी हे राजा, जब उन्हें अन्न तथा घी से बना व्यंजन योग्य ब्राह्मणों के मुख से होकर अर्पित किया जाता है, तो वे और भी प्रसन्न होते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (३.९) में कहा गया है—यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:—सभी कर्म यज्ञ के लिए किये जाने चाहिए और यज्ञ कृष्ण को तुष्ट करने के निमित्त होना चाहिए। भगवद्गीता में अन्यत्र (५.२९) भी कहा गया है—भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्—वे परमेश्वर हैं और प्रत्येक वस्तु के भोक्ता हैं। यद्यपि यज्ञ कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, किन्तु जब अन्न तथा घी को अग्नि में न डालकर प्रसाद के रूप में सर्वप्रथम ब्राह्मणों को और बाद में अन्यों को वितरित किया जाता है, तो वे अधिक प्रसन्न होते हैं। इस विधि से कृष्ण अन्य किसी विधि की तुलना में अधिक प्रसन्न होते हैं। वर्तमान काल में तो अग्नि तथा घी की आहुति डाल कर यज्ञ करने की बहुत कम सम्भावना रह गई है। विशेष रूप से भारत में तो घी न होने के बराबर है। प्रत्येक वस्तु जो घी से तैयार होनी चाहिए अब एक प्रकार के तेल से बनाई जाती है। किन्तु यज्ञ अग्नि में तेल डालने की संस्तुति कमी नहीं की जाती है। कलियुग
में अन्न तथा घी की उपलब्ध मात्रा धीरे-धीरे घट रही है और लोग चिन्तित हैं कि वे इनकी प्रचुर मात्रा उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में शास्त्रों का आदेश है—यज्ञै: संङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस:। इस युग में बुद्धिमान लोग संकीर्तन आन्दोलन द्वारा यज्ञ सम्पन्न करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि संकीर्तन आन्दोलन में सम्मिलित हो और अपने ज्ञान तथा धन की आहुति इस आन्दोलन की अग्नि में डाले। हम अपने सङ्कीर्तन आन्दोलन या हरे कृष्ण आन्दोलन में अर्चाविग्रह पर भव्य प्रसाद चढ़ाते हैं और बाद में उस प्रसाद को ब्राह्मणों, वैष्णवों एवं सामान्य लोगों में वितरित करते हैं। कृष्ण का प्रसाद ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को दिया जाता है और ब्राह्मणों एवं वैष्णवों का प्रसाद जनता को। इस प्रकार का यज्ञ जिसमें हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन किया जाता है और प्रसाद वितरण होता है, या विष्णु को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ की सर्वाधिक पूर्ण तथा प्रामाणिक विधि है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥