श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 24

 
श्लोक
त एते श्रेयस: काला नृणां श्रेयोविवर्धना: ।
कुर्यात्सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुष: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
ते—इसलिए; एते—ये सब (ज्योतिष सम्बन्धी गणनाएँ); श्रेयस:—कल्याण के; काला:—समय; नृणाम्—मनुष्यों का; श्रेय:—कल्याण; विवर्धना:—बढ़ाते हैं; कुर्यात्—करे; सर्व-आत्मना—अन्य कार्यों से (केवल श्राद्ध कर्म ही नहीं); एतेषु— इन (ऋतुओं) में; श्रेय:—कल्याण (करने वाले); अमोघम्—तथा सफलता; तत्—मनुष्य की; आयुष:—आयु का ।.
 
अनुवाद
 
 ऋतुओं के सारे अवसर मानवता के लिए अत्यन्त शुभ माने जाते हैं। ऐसे अवसरों पर सारे कल्याण (शुभ) कार्य किये जाने चाहिए, क्योंकि ऐसे कार्यों से मनुष्य अपने छोटे से जीवनकाल में सफलता प्राप्त कर लेता है।
 
तात्पर्य
 जब किसी को प्राकृतिक विकास के द्वारा मनुष्य रूप प्राप्त होता है, तो उसे अगली प्रगति का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेना चाहिए। जैसाकि भगवद्गीता (९.२५) में कहा गया है— यान्ति देवव्रता देवान्—जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वे उनके लोकों को जाते हैं। यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्—और यदि कोई भगवान्
की भक्ति करता है, तो वह भगवद्धाम वापस जाता है। अतएव मनुष्य जीवन में उसे कल्याणकार्य करने होते हैं जिससे वह भगवद्धाम लौट सके। किन्तु भक्ति भौतिक परिस्थितियों पर आश्रित नहीं है। अहैतुक्यप्रतिहता। जो लोग सकाम कर्म में लगे हैं उनके लिए उपर्युक्त काल तथा वस्तुएँ अत्यन्त अनुकूल हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥