श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 27-28

 
श्लोक
अथ देशान्प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेयआवहान् ।
स वै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते ॥ २७ ॥
बिम्बं भगवतो यत्र सर्वमेतच्चराचरम् ।
यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; देशान्—स्थानों का; प्रवक्ष्यामि—वर्णन करूँगा; धर्म-आदि—धार्मिक कृत्य आदि.; श्रेय—कल्याण; आवहान्—जो ला सकता है; स:—वह; वै—निस्सन्देह; पुण्य-तम:—सर्वाधिक पवित्र; देश:—स्थान; सत्-पात्रम्—वैष्णव; यत्र—जहाँ; लभ्यते—उपलब्ध होता है; बिम्बम्—अर्चाविग्रह (मन्दिर में); भगवत:—भगवान् का (जो आश्रय हैं); यत्र— जहाँ; सर्वम् एतत्—इस समग्र विराट जगत का; चर-अचरम्—सारे जड़ तथा चेतन प्राणियों सहित; यत्र—जहाँ; ह—निस्सन्देह; ब्राह्मण-कुलम्—ब्राह्मणों की संगति; तप:—तपस्या; विद्या—शिक्षा; दया—कृपा; अन्वितम्—से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : अब मैं उन स्थानों का वर्णन करूँगा जहाँ धार्मिक अनुष्ठान अच्छी तरह सम्पन्न किये जा सकते हैं। जिस किसी स्थान में वैष्णव हो वह स्थान समस्त कल्याणकारी कृत्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ है। भगवान् समस्त चर तथा अचर प्राणियों समेत इस समग्र विराट जगत के आश्रय हैं और वह मन्दिर जहाँ भगवान् का अर्चाविग्रह स्थापित किया जाता है सर्वाधिक पवित्र स्थान होता है। यही नहीं, जिन स्थानों में विद्वान ब्राह्मण तपस्या, विद्या तथा दया के द्वारा वैदिक नियमों का पालन करते हैं, वे भी अत्यन्त शुभ तथा पवित्र होते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में सूचित किया गया है कि जिस मन्दिर में भगवान् कृष्ण की पूजा होती है और जहाँ वैष्णवजन भगवान् की सेवा में लगे रहते हैं वह किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को सम्पन्न करने का सर्वोत्तम पवित्र स्थल है। इस समय विशेष रूप से बड़े-बड़े नगरों में लोग छोटे-छोटे कक्षों में रहते हैं और अर्चाविग्रह या मन्दिर स्थापित करने में समर्थ नहीं होते। अतएव ऐसी परिस्थितियों
में बढ़ते हुए इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा स्थापित किये जा रहे केन्द्र तथा मन्दिर धार्मिक उत्सवों को सम्पन्न करने के लिए सर्वाधिक पवित्र स्थान हैं। यद्यपि सामान्य लोग धार्मिक उत्सवों या अर्चाविग्रह पूजा में रुचि नहीं रखते, तथापि कृष्णभावनामृत आन्दोलन हर एक को कृष्णभावनाभावित होकर आध्यात्मिक जीवन में आगे बढऩे का अवसर प्रदान करता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥