श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 29

 
श्लोक
यत्र यत्र हरेरर्चा स देश: श्रेयसां पदम् ।
यत्र गङ्गादयो नद्य: पुराणेषु च विश्रुता: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र यत्र—जहाँ कहीं; हरे:—भगवान् कृष्ण की; अर्चा—अर्चाविग्रह पूजा जाता है; स:—वह; देश:—स्थान, देश या पड़ोस; श्रेयसाम्—समस्त कल्याण का; पदम्—स्थान; यत्र—जहाँ; गङ्गा-आदय:—गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी जैसी; नद्य:—पवित्र नदियाँ; पुराणेषु—पुराणों में; च—भी; विश्रुता:—प्रसिद्ध हैं ।.
 
अनुवाद
 
 निस्सन्देह, वे स्थान कल्याणकारी हैं जहाँ भगवान् कृष्ण का मन्दिर हो जिसमें उनकी विधिवत् पूजा होती हो। वे स्थान भी कल्याणकारी हैं जहाँ पुराणों जैसे अनुपूरक वैदिक शास्त्रों में उल्लिखित गंगा सदृश प्रसिद्ध पवित्र नदियाँ बहती हैं। निश्चय ही वहाँ जो भी आध्यात्मिक कार्य किया जाता है, वह अत्यन्त प्रभावशाली होता है।
 
तात्पर्य
 ऐसे अनेक नास्तिक हैं, जो मन्दिर में भगवान् के अर्चाविग्रह के पूजन का विरोध करते हैं। किन्तु इस श्लोक में यह प्रमाण सहित कहा गया है कि जिस किसी स्थान में अर्चाविग्रह पूजा जाता है, वह दिव्य है; उसका सम्बन्ध इस भौतिक जगत से नहीं रह जाता। यह भी कहा गया है कि जंगल सतोगुणी होता है, अतएव जो लोग आध्यात्मिक जीवन का अनुशीलन करना चाहते हैं, उन्हें जंगल चले जाना चाहिए (वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ) लेकिन मनुष्य को बन्दर की भाँति जंगल में रहने मात्र के लिए नहीं जाना चाहिए। बन्दर तथा अन्य हिंस्र पशु भी जंगल में रहते हैं, किन्तु जो मनुष्य आध्यात्मिक संस्कृति के लिए जंगल जाता है उसे भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी चाहिए (वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत )।
मनुष्य को केवल जंगल जाने से संतुष्ट नहीं होना है; उसे भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी होती है। इसीलिए इस युग में चूँकि आध्यात्मिक संस्कृति के लिए जंगल जाना असम्भव है, अतएव मनुष्य को यह संस्तुति की जाती है कि वह मन्दिर-समुदाय में भक्त के रूप में रहे, अर्चाविग्रह की नियमित पूजा करे, विधि-विधानों का पालन करे तथा उस स्थान को वैकुण्ठ की भांति बना दे। जंगल सतोगुणी, शहर तथा ग्राम रजोगुणी एवं वेश्यालय, होटल तथा रेस्तरां तमोगुणी हो सकते हैं, किन्तु जब कोई मन्दिर-समुदाय में रहता है, तो वह वैकुण्ठ में रहता है। अतएव यहाँ श्रेयसां पदम् कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह श्रेष्ठ, सर्वाधिक शुभ स्थान है।

हम सारे विश्व में कई स्थानों पर मन्दिर-समुदायों का निर्माण करा रहे हैं जिससे भक्तों को आश्रय प्राप्त हो और वे मन्दिर में अर्चाविग्रह का पूजन कर सकें। अर्चाविग्रह का पूजन भक्तों के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता। ऐसे मन्दिर-पूजक (पुजारी) जो भक्तों को महत्त्व नहीं दे पाते निम्न श्रेणी के होते हैं। वे कनिष्ठ अधिकारी हैं। श्रीमद्भागवत (११.२.४७) में कहा गया है : अर्चायामेव हरये पूजां य: श्रद्धयेहते।

न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्त: प्राकृत: स्मृत: ॥

“जो व्यक्ति मन्दिर में अर्चाविग्रह के पूजन में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक लगा रहता है किन्तु भक्तों या सामान्य लोगों के प्रति व्यवहार करना नहीं जानता वह प्राकृत भक्त या कनिष्ठ अधिकारी कहलाता है।” अतएव मन्दिर में भगवान् का अर्चाविग्रह होना चाहिए और भक्तों को भगवान् की पूजा करनी चाहिए। भक्तों एवं अर्चाविग्रह का यह मेल उच्चकोटि का दिव्य स्थान उत्पन्न करता है।

इसके अतिरिक्त यदि गृहस्थ भक्त अपने घर में शालग्राम शिला पूजता है, तो उसका घर भी महान् स्थल बन जाता है। अतएव तीनों उच्च वर्णों के लोग—ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य—शालग्राम शिला या राधाकृष्ण अथवा सीताराम के लघु अर्चाविग्रहों की पूजा अपने-अपने घरों में करते थे। इससे प्रत्येक वस्तु कल्याणकारी बन जाती थी। किन्तु अब उन्होंने अर्चाविग्रह पूजा बन्द कर दी है। लोग आधुनिक बन चुके हैं जिससे वे सभी तरह से पापपूर्ण कृत्यों में अपने को लगाते हैं, अतएव वे अत्यधिक दुखी हैं।

इसलिए वैदिक सभ्यता के अनुसार तीर्थस्थलों को अत्यन्त पवित्र माना जाता है और आज भी सैकड़ों-हजारों तीर्थस्थान हैं—यथा जगन्नाथपुरी, वृन्दावन, हरद्वार, रामेश्वर, प्रयाग तथा मथुरा। भारत तो पूजा करने या आध्यात्मिक जीवन का अनुशीलन करने का स्थान है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन संसार भर के प्रत्येक व्यक्ति को जातिपाँति का भेदभाव किये बिना अपने केन्द्रों में आने और आध्यात्मिक जीवन का पूर्णतया अनुशीलन करने के लिए आमंत्रित करता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥